सर्वोच्च न्यायालय ने देश भर में जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी
दौड़ के आयोजनों में सांडों को शामिल करने पर 7 मई 2014
को प्रतिबंध लगा दिया. इसके साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ नियम
शर्तों के साथ जल्लीकट्टू को मंजूरी देने वाला तमिलनाडु का कानून निरस्त कर दिया.
साथ ही भारतीय संसद द्वारा पशुओं के अधिकारों को संवैधानिक अधिकार का दर्जा प्रदान
करने की आशा व्यक्त की. यह निर्णय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यामयूर्ति
केएस राधाकृष्णन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने एनीमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया की
याचिका पर दिया.
सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारों और भारतीय पशु कल्याण बोर्ड को पशुओं को अनावश्यक पीड़ा पहुंचाने से रोकने के लिए उचित कदम उठाने का निर्देश दिया.
खंडपीठ के निर्णय के अनुसार पशुओं सहित सभी जीव-जंतुओं में स्वाभाविक गरिमा और शांतिपूर्ण तरीके से जीने का अधिकार होता है और उनकी बेहतरी के अधिकारों का संरक्षण होना चाहिए. खंडपीठ ने कहा कि पशुओं के अधिकारों की रक्षा करना न्यायालय का कर्तव्य है क्योंकि वे मानव की तुलना में अपनी देखभाल करने में सक्षम नहीं हैं. पशुओं का भी सम्मान और गरिमा होती है और उन्हें उनके अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता.
जल्लीकट्टू या बैलगाड़ी दौड़
जल्लीकट्टू एक प्रकार की बैलगाड़ी दौड़ है. इस खेल का आयोजन मुख्यतः महाराष्ट्र और तमिलनाडु में पोंगल के समय प्रतिवर्ष जनवरी और फरवरी माह में किया जाता है. इस दौरान जल्लीकट्टू में हिस्सा लेने वाले बैलों पर तरह तरह के अत्याचार किए जाते हैं. कई बार उन्हें उग्र करने के लिए शराब पिलाई जाती है और कई बार उनके संवेदनशील अंगों और आंखों में मिर्च पाउडर लगाया जाता है जिससे बैल उग्र होकर तेजी से भागें.
विदित हो कि यह खेल मुख्यतः तमिलनाडु और महाराष्ट्र में ही होता है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इन दोनों राज्यों के अलावा पूरे देश में बैलगाड़ी दौड़ जैसे आयोजनों पर प्रतिबंध लगा दिया है.
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