इसरो ने देश के तीसरे क्षेत्रीय निगरानी उपग्रह आईआरएनएसएस -1सी को श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित किया-(16-OCT-2014) C.A

| Thursday, October 16, 2014
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने देश के तीसरे क्षेत्रीय निगरानी उपग्रह आईआरएनएसएस- 1सी (IRNSS 1C, Indian Regional navigational satellite System) को आंध्रप्रदेश में स्थित श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान पीएसएलवी-सी 26 (Polar Satellite Vehicle C 26, PSLV-C 26) के द्वारा 16 अक्टूबर 2014 को प्रक्षेपित किया. आईआरएनएसएस-1सी को पीएसएलवी- सी 26 एसएचएआर रेंज के पहले लांच पैड से एक बजकर 32 मिनट पर प्रक्षेपित किया गया और प्रक्षेपण के 20 मिनट बाद प्रक्षेपण यान ने सफलतापूर्वक उपग्रह को पृथ्वी की लक्षित कक्षा में स्थापित कर दिया.
इस उपग्रह का वजन 1425.4 किलोग्राम और इसका कार्यकाल दस वर्ष है. यह उपग्रह आईआरएनएसएस श्रृंखला के सात उपग्रहों में से तीसरा है. 
इसरो ने इस उपग्रह को 17.86 डिग्री के झुकाव के साथ पृथ्वी से सर्वाधिक समीप की दूरी 284 किलोमीटर तथा पृथ्वी से सर्वाधिक दूरी 20,650 किलोमीटर पर सब जियोसिंक्रोनस ट्रांसफर ऑर्बिट (सब जीटीओ) में स्थापित करने का लक्ष्य रखा था.

भारत ने इंडियन रीजनल नेविगेशनल सैटेलाइट सिस्टम (आइआरएनएसएस) श्रृंखला के पहले दो नौवहन उपग्रह आइआरएनएसएस 1 ए और आइआरएनएसएस 1 बी का प्रक्षेपण क्रमश: 1 जुलाई 2013 को और 4 अप्रैल 2014 को श्रीहरिकोटा से किया गया था.

नेवीगेशनल सिस्टम से दो प्रकार की सेवाएं प्राप्त होंगी. प्रथम स्टैंडर्ड पोजिशनिंग सर्विस जो सभी उपयोग कर्ताओं को उपलब्ध करायी जाती है और दूसरी रिसट्रिक्टिड सर्विस जो केवल अधिकृत उपयोग कर्ताओं को ही प्रदान की जाती है.
आईआरएनएसएस सिस्टम में अंतत: सात उपग्रह शामिल होंगे और इसे 1420 करोड़ रुपये की लागत से वर्ष 2015 तक पूरा किए जाने का लक्ष्य रखा गया है.

यह सातवां अवसर है जब इसरो ने अपने अभियानों के लिए पीएसएलवी के एक्सएल संस्करण का इस्तेमाल किया. आईआरएनएसएस 1 सी के साथ पीएसएलवी 26 को वास्तव में 10 अक्टूबर 2014 को प्रक्षेपित किया जाना था लेकिन कुछ तकनीकी कारणों से इसके प्रक्षेपण को स्थगित कर दिया गया. पूरी तरह से विकसित आईआरएनएसएस सिस्टम में पृथ्वी से 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर जीईओ स्थतिक कक्षा में तीन उपग्रह होंगे तथा चार उपग्रह भूस्थतिक कक्षा में होंगे.

विश्लेषण 
इस सफलता से यह माना जा रहा है कि भारत अमेरिका के ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम की बराबरी पर आकर देश का खुद का नेवीगेशन सिस्टम स्थापित करने की दिशा में और एक कदम आगे बढ़ गया है.


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