फ्रेंड्स ऑफ़ मरीन लाइफ (एफएमएल) नामक एनजीओ के लिए काम करने वाली स्कूबा डाइवर्स की टीम ने दिसम्बर 2015 को स्नोफ्लेक मूंगे की विभिन्न प्रजातियों के विकास को रिकॉर्ड किया. यह विकास तिरुवनंतपुरम एवं कन्याकुमारी तटों से कुछ दूर देखने को मिला.
वैज्ञानिकों के अनुसार मूंगे की इस प्रजाति के इतने तेज़ी से बढ़ने के कारण क्षेत्र की समुद्री पारिस्थितिकी को खतरा उत्पन्न हो गया है.
वैज्ञानिकों के अनुसार मूंगे की इस प्रजाति के इतने तेज़ी से बढ़ने के कारण क्षेत्र की समुद्री पारिस्थितिकी को खतरा उत्पन्न हो गया है.
इस प्रजाति की खोज तिरुवनंतपुरम में कोवलम समुद्री किनारे से 10 मीटर गहराई में तथा कन्याकुमारी में एनायम स्थित 18 मीटर गहराई में की गयी.
इस प्रजाति को क्षेत्रीय मछुआरों की जानकारी में वृद्धि एवं पारंपरिक धारणाओं के तहत क्षेत्र में समुद्री पारिस्थितिकी को बेहतर बनाने के उद्देश्य से खोजा गया. यह परियोजना शोधकर्ता रोबर्ट पनिपिल्ला द्वारा संचालित की गयी.
स्नोफ्लेक मूंगा
• कारिजोया रिसेई अथवा स्नोफ्लेक मूंगा क्लावुलारिया प्रजाति से जाना जाता है.
• इसका मूल निवास उष्णकटिबंधीय पश्चिमी अटलांटिक महासागर, कैरेबियन सागर और मैक्सिको की खाड़ी है. इसकी रेंज ब्राजील से दक्षिण कैरोलिना तक फैली हुई है.
• यह विश्व के अन्य क्षेत्रों जैसे अमेरिका स्थित हवाई में भी पाया जा रहा है.
• यह छाया में उगने वाली प्रजाति है जो पानी के नीचे उन स्थानों पर उगती है जहां प्रकाश कम होता है. यह गुफाओं, पत्थरों के नीचे आदि स्थानों पर देखी जा सकती है. यह किसी भी प्रकार के पदार्थ जैसे धातु, लकड़ी, कंक्रीट, प्लास्टिक अथवा रस्सी पर भी उग सकती है.
• यह तेज़ धाराओं या लहरों में किसी भी स्थिति में पानी में पनपती है.
इस प्रजाति को क्षेत्रीय मछुआरों की जानकारी में वृद्धि एवं पारंपरिक धारणाओं के तहत क्षेत्र में समुद्री पारिस्थितिकी को बेहतर बनाने के उद्देश्य से खोजा गया. यह परियोजना शोधकर्ता रोबर्ट पनिपिल्ला द्वारा संचालित की गयी.
स्नोफ्लेक मूंगा
• कारिजोया रिसेई अथवा स्नोफ्लेक मूंगा क्लावुलारिया प्रजाति से जाना जाता है.
• इसका मूल निवास उष्णकटिबंधीय पश्चिमी अटलांटिक महासागर, कैरेबियन सागर और मैक्सिको की खाड़ी है. इसकी रेंज ब्राजील से दक्षिण कैरोलिना तक फैली हुई है.
• यह विश्व के अन्य क्षेत्रों जैसे अमेरिका स्थित हवाई में भी पाया जा रहा है.
• यह छाया में उगने वाली प्रजाति है जो पानी के नीचे उन स्थानों पर उगती है जहां प्रकाश कम होता है. यह गुफाओं, पत्थरों के नीचे आदि स्थानों पर देखी जा सकती है. यह किसी भी प्रकार के पदार्थ जैसे धातु, लकड़ी, कंक्रीट, प्लास्टिक अथवा रस्सी पर भी उग सकती है.
• यह तेज़ धाराओं या लहरों में किसी भी स्थिति में पानी में पनपती है.
प्रजाति का आवधिक विकास
स्नोफ्लेक मूंगा को सबसे पहले वर्ष 1972 में हवाई में खोजा गया था जो पर्ल हार्बर में देखी गयी. इसके बाद यह अन्य महाद्वीपों जैसे ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया एवं फिलिपिन्स में भी फैल गयी.
भारत के सन्दर्भ में, इसे निकोबार स्थित कुंडोल द्वीप पर मई 2009 में खोजा गया. इसके बाद समस्त मूंगे की चट्टानों वाले क्षेत्र में इसे पाया जाने लगा जिसमें मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, गोवा एवं अंडमान निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं.
खतरा
इसके विस्तार से अन्य प्रजातियों को खतरा हो सकता है जैसे मूंगा, स्पोंज, काई, एसीडीयन्स आदि. यह प्रजातियां समुद्री पारिस्थितिकी में संतुलन बनाये रखती हैं जिन्हें खतरा हो सकता है. इनकी अधिकता से मूंगे की चट्टानों को खतरा हो सकता है जिससे यहां की अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए भोजन एवं निवास की समस्या उत्पन्न हो सकती है.
स्नोफ्लेक मूंगा को सबसे पहले वर्ष 1972 में हवाई में खोजा गया था जो पर्ल हार्बर में देखी गयी. इसके बाद यह अन्य महाद्वीपों जैसे ऑस्ट्रेलिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया एवं फिलिपिन्स में भी फैल गयी.
भारत के सन्दर्भ में, इसे निकोबार स्थित कुंडोल द्वीप पर मई 2009 में खोजा गया. इसके बाद समस्त मूंगे की चट्टानों वाले क्षेत्र में इसे पाया जाने लगा जिसमें मन्नार की खाड़ी, कच्छ की खाड़ी, गोवा एवं अंडमान निकोबार द्वीप समूह शामिल हैं.
खतरा
इसके विस्तार से अन्य प्रजातियों को खतरा हो सकता है जैसे मूंगा, स्पोंज, काई, एसीडीयन्स आदि. यह प्रजातियां समुद्री पारिस्थितिकी में संतुलन बनाये रखती हैं जिन्हें खतरा हो सकता है. इनकी अधिकता से मूंगे की चट्टानों को खतरा हो सकता है जिससे यहां की अन्य समुद्री प्रजातियों के लिए भोजन एवं निवास की समस्या उत्पन्न हो सकती है.
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