पश्चिमी घाट में मेढक की नयी प्रजाति ‘डांसिंग फ्रॉग’ मिली-(13-MAY-2014) C.A

| Tuesday, May 13, 2014
दक्षिणी भारत के पश्चिमी घाट में जीव वैज्ञानिकों ने डांसिंग फ्रॉगकी 14 नयी प्रजातिओं की खोज की है. इन छोटे कलाबाजी युक्त उभयचर मेंढकों को भारतीय जीव वैज्ञानिकों द्वारा खोजा गया है. भारतीय डांसिंग फ्रॉगको वैज्ञानिक रूप से मिक्रिक्सालिडे के रूप में जाना जाता है और उनका परिवार एक ही जीनस मिक्रिक्सालुस में शामिल हैं. इन मेंढकों को यह नाम प्रजनन मौसम में नर क्लिक करें मेंढक द्वारा विशेष प्रकार से पैर झटकने के तरीक़े के कारण दिया गया है.
अन्य डांसिंग फ्रॉगकी प्रजातियां मध्य अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया में पाई जाती हैं. भारतीय डांसिंग फ्रॉगपरिवार 85 मिलियन वर्षों पहले विकसित हुआ.
आणविक डीएनए मार्कर और रूपात्मक वर्णन का उपयोग करके इनकी पहचान की गई हैं. जीववैज्ञानिकों के अनुसार ये वार्षिक मानसून के बाद तीव्र धाराओं में प्रजनन करते हैं. उनका आकार एक कारण है की जब धारा का स्तर नीचे चला जाता है तभी प्रजनन होता हैं. नदियों का जल जब सूख जाता हैं तब मामला विलोमतः है ऐसी स्थिति में वे प्रजनन के लिए सही स्थान में नहीं रहते हैं.
ये मेंढ़क आकार में छोटे हैं और एक अखरोट से बडें नहीं होते हैं और वे पहाड़ धारा द्वारा आसानी से बहा लिए जाते है. जीववैज्ञानिकों ने पहचान की हैं की उनका आवास स्थल तेजी से सूख रहा हैं. इन नयी प्रजातिओं की खोज का अध्ययन सीलोन जर्नल ऑफ़ साइंस पत्रिका में 8 मई 2014 प्रकाशित हुआ था. इस खोज ने पहचाने गए भारतीय डांसिंग फ्रॉगकी संख्या को 24 तक पहुंचा दिया हैं.
नई प्रजाति के बारे में कुछ तथ्य
·         नृत्य केवल नर द्वारा किया जाता है, नृत्य प्रजनन के लिए किये गए अद्वितीय व्यवहार का हिस्सा हैं जिसको फुट फ्लैगिंगकहा जाता हैं. फुट फ्लैगिंग में नर मेंढक अपने पैर खींचते और झटकते हैं तथा यह गतिविधि मादा का ध्यान आकर्षित करने के लिए की जाती है.
·         जीववैज्ञानिकों द्वारा सुझाव दिया जाता हैं की मादा को चूँकि बारहमासी पहाड़ी नदियों के बहने की आवाज के कारण संभोग रव सुनने में परेशानी होती हो अत: नृत्य किया जाता है.
·         जीववैज्ञानिकों यह भी सुझाव देते हैं की नृत्य मेंढक के आकार पर निर्भर करता हैं, बड़े आकार का मेंढक अधिक नृत्य करता हैं. अन्य डांसिंग फ्रॉगकी प्रजातियां मध्य अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया में पाई जाती हैं.
·         भारतीय डांसिंग फ्रॉगपरिवार 85 मिलियन वर्षों पहले विकसित हुआ. भारतीय डांसिंग फ्रॉगको वैज्ञानिक रूप से मिक्रिक्सालिडे के रूप में जाना जाता है और उनका परिवार एक ही जीनस मिक्रिक्सालुस में शामिल हैं.
खोज के बारे में
ये प्रजातियाँ 12 वर्षों के व्यापक क्षेत्र अध्ययन जो की केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पश्चिमी घाट के पहाड़ों में आयोजित किया गया के पश्चात् मिली.
परियोजना के प्रमुख वैज्ञानिक: सत्यभामा दास बीजू, दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर
पश्चिमी घाट, जो की हिमालय से पुरातन है, को जैविक खतरा
पश्चिमी घाट दुनिया का सबसे अधिक जैविक रोमांचक क्षेत्रों में है और भारतीय प्रजातियों में से एक चौथाई यही पाई जाती हैं. यह विश्व की 325 से अधिक संकटग्रस्त पादप, उभयचर, सरीसृप, पक्षी और मछली की प्रजातिओं का निवास स्थल हैं. हाल के कुछ दशकों में घाट के लिए कुछ बुनियादी खतरों निम्न रहे हैं-
•    लोहा और बॉक्साइट खनन से लगातार खतरा
•    जल प्रदूषण
•    अनियमित खेती और मानव बस्तियों के लिए निवास स्थान के कारण नुकसान
जनसंख्या वृद्धि के कारण पश्चिमी घाट के वनों को 25 प्रतिशत की हानि हुई है.
2010 की अपनी रिपोर्ट में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने जलवायु परिवर्तन के कारण बदलते वर्षा प्रतिरूप का असर पश्चिमी घाट पर पड़ने का दावा किया. इस रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया की यह वर्षा प्रतिरूप आने वाले समय में और अधिक अनियमित बढ़ेगा, जिसको हाल के दिनों में अन्य वैज्ञानिक अध्ययनों द्वारा समर्थित किया गया हैं.
पश्चिमी घाट के संरक्षण के लिए उठाए गए कदम
पश्चिमी घाट पर्यावरण के क्षेत्र की सुरक्षा के लिए प्रदूषण फैलाने वाले औद्योगिक गतिविधियों और मानव अतिक्रमण को सीमित करने के लिए भारत सरकार ने कई कदम उठायें हैं उनमे से कुछ निम्न हैं-
•    छह राज्यों में पश्चिमी घाट के लगभग 60,000 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र (ईएसए) में परिवर्तित करने का निर्णय.
•    सम्पूर्ण सीमा में खनन, उत्खनन, ताप विद्युत संयंत्रों और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर प्रतिबन्ध
•    क्षेत्र में अन्य सभी परियोजनाओं जिनकी अनुमति हैं को प्रारंभ करने के लिए गांव परिषदों (ग्राम सभा) की पूर्व सहमति लेने को अनिवार्य कर दिया गया हैं.
यह निर्णय पश्चिमी घाट पर बनी दो रिपोर्टों की एक अनुवर्ती कार्रवाई के रूप में जयंती नटराजन के नेतृत्व में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा लिया गया था.
वो दो रिपोर्ट निम्न थी-
•    एक परिस्थिति विज्ञान शास्री माधव गाडगिल की अध्यक्षता में एक आयोग द्वारा प्रस्तुत की गयी थी
•    दूसरा रिपोर्ट योजना आयोग के सदस्य के कस्तूरीरंगन द्वारा प्रस्तुत की गयी थी.


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