ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ रथ यात्रा का शुभारम्भ-(08-JUL-2016) C.A

| Friday, July 8, 2016
धार्मिक महोत्सवों में सबसे प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण दस दिवसीय महोत्सव का 06 जुलाई 2016 को शुभारम्भ हो गया. भगवान् जगन्नाथ की रथयात्रा प्रति वर्ष आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की द्वितीया को आरम्भ होती है. इस यात्रा को 'गुण्डीय यात्रा' भी कहा जाता है. 'गुंडीचा मंदिर' भगवान की मौसी का घर है, जहां विश्वकर्मा ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया. इसे 'गुंडीचा बाड़ी' भी कहते हैं. 

इसकी तैयारी अक्षय तृतीया से श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण से शुरू हो जाती है. भारत के चार पवित्र धामों में से एक पुरी के 800 वर्ष पुराने मंदिर में योगेश्वर श्रीकृष्ण जगन्नाथ रूप में विराजते हैं. साथ ही यहाँ बलभद्र एवं सुभद्रा भी हैं.

वर्तमान रथयात्रा में जगन्नाथ की दशावतारों में पूजा होती है. उनमें विष्णु, कृष्ण और वामन और बुद्ध हैं. चलते समय रथ शब्द करता है. सबसे आगे बलराम का रथ 'तलध्वज' चलता है. उसके पीछे सुभद्रा का रथ 'पद्मध्वज' अंत में जगन्नाथ जी का रथ 'गरुड़ध्वज' या 'कपिलध्वज' होता है. दसवें दिन इस यात्रा का समापन हो जाता है.

पुरी का मंदिर-
उच्चस्तरीय नक़्क़ाशी और भव्यता लिए यह मंदिर भक्तों की आस्था केंद्र है. मन्दिर में तीन मूर्तियाँ हैं- जिनमे भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, व उनकी बहन सुभद्रा की काष्ठ निर्मित मूर्तियाँ हैं. यह मूर्तियाँ आदिवासी मुखाकृति के साथ अधिक सौम्यता रखती हैं. पुरी का मुख्य मंदिर बारहवीं सदी में राजा अनंतवर्मन के शासनकाल के समय बनाया. उसके बाद जगन्नाथ जी के 120 मंदिर बनाए गए.

इतिहास
पौराणिक कथाओं के अनुसार 'राजा इन्द्रद्युम्न' भगवान जगन्नाथ को 'शबर राजा' से यहां लेकर आये तथा उन्होंने मूल मंदिर का निर्माण कराया. इसका कब निर्माण हुआ और यह कब नष्ट हो गया इस बारे में कुछ स्पष्ट नहीं है. वर्तमान 65 मीटर ऊंचे मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में चोल 'गंगदेव' तथा 'अनंग भीमदेव' ने कराया.

प्रथाएँ
यात्रा आरंभ होने से पहले पूर्व राजाओं के वंशज पारंपरिक ढंग से सोने के हत्थे वाली झाडू से ठाकुर जी के प्रस्थान मार्ग को बुहारते हैं. सुभद्रा के द्वारिका भ्रमण की इच्छा पूर्ण करने के उद्देश्य से श्रीकृष्ण व बलराम ने अलग रथों में बैठकर रथयात्रा करवाई थी. सुभद्रा की नगर भ्रमण की स्मृति में यह रथयात्रा पुरी में हर वर्ष आयोजित की जाती है.

बाहुड़ा यात्रा
आषाढ़ शुक्ल दशमी को जगन्नाथ जी की वापसी यात्रा शुरू होती है. इसे बाहुड़ा यात्रा कहते हैं. शाम से पूर्व ही रथ जगन्नाथ मंदिर तक पहुंच जाते हैं. जहां एक दिन प्रतिमाएं भक्तों के दर्शन के लिए रथ में ही रखी रहती हैं. अगले दिन प्रतिमाओं को मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के गर्भगृह में पुन: स्थापित कर दिया जाता है. आगामी एकादशी के दिन मन्दिर के द्वार देवी- देवताओं हेतु खोल दिए जाते हैं. इनका शृंगार विभिन्न आभूषणों व शुद्ध स्वर्ण से किया जाता है. इस धार्मिक कार्य को 'सुनबेसा' कहा जाता है. रथ का मेला वृन्दावन, उत्तर प्रदेश में भी आयोजित किया जाता है.

रथ का निर्माण
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा के लिए रथों का निर्माण लकड़ियों से होता है। इसमें कोई भी कील या काँटा, किसी भी धातु का नहीं लगाया जाता.

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