पॉपकॉर्न जैसे जीवाश्मों द्वारा प्रजातियों के विकास पर पर्यावरण के प्रभाव के सबूत मिले-(16-JUNE-2016) C.A

| Thursday, June 16, 2016
सूक्ष्म जलीय जीव के जीवाश्म रिकॉर्ड का विश्लेषण करने वाले अनुसंधान प्लानक्टोनिक फोरामिनीफेरा द्वारा यह ज्ञात हुआ कि पॉपकॉर्न जैसे दिखने वाले जीवाश्म प्रजातियों के विकास पर पर्यावरण के प्रभाव का गहरा असर होता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथेंपटन के अनुसार पृथ्वी पर बसने वाले जीव पर्यावरण के बदलावों पर निर्भर करते हैं.

परिस्थितिविज्ञान शोधकर्ता डॉ थॉमस एज़ार्ड इस अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता थे.

इस अध्ययन को इकोलॉजी लैटर्स नामक पत्रिका के जून अंक में प्रकाशित किया गया.
अध्ययन के मुख्य बिंदु

•    पृथ्वी पर अनंत प्रजातियों का विचार स्पष्ट रूप से काल्पनिक है. विविधता की सीमा प्रासंगिकता विकासवादी जीव, भूवैज्ञानिकों और पुरातत्व-वैज्ञानिकों के बीच चर्चा का विषय है.

•    अध्ययन में यह पता चला है कि ऊपरी सीमा पर्यावरण की दृष्टि पर निर्भर है.

•    इससे यह समझा जा सकता है कि पर्यावरण में बदलाव से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक बदलाव आते हैं जबकि ध्रुवों पर इसका प्रभाव कम दिखता है.

•    इससे यह भी पता चला है कि बड़े पैमाने पर जलवायु उथल-पुथल के दौर से गुजरने के बाद भी प्रजातियों की संख्या उतनी ही रही लेकिन उनमे बदलाव देखे गये.

•    इस शोध में इस बात को भी नकार दिया गया कि प्रजातियों में एक जैसे बदलाव नहीं होते न ही बदलाव के दौरान उनकी संख्या को नियंत्रित करने का कोई नियम है.

•    जलवायु और भूविज्ञान सदैव बदलता रहता है और प्रजातियों की सीमा उन लोगों के साथ बदलती है.

•    इससे पहले हुए शोध जैविक, जलवायु परिवर्तन अथवा भूवैज्ञानिक स्पष्टीकरण पर आधारित थे लेकिन नई शोध में प्रजातियों के आपसी व्यवहार को भी दर्शाया गया है.

•    शोध के अनुसार प्रजातियों के आपसी प्रतिद्वंद द्वारा उनके बीच संतुलन बना रहता है.

•    पर्यावरण में हो रहे बदलावों को मापने हेतु गणितीय समीकरणों का सहारा लिया गया.

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