राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भारत के पूर्व प्रधान न्यायाधीश
न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम (पल्लानिस्वामी सदाशिवम) को केरल का राज्यपाल 3 सितंबर 2014 को नियुक्त किया. उच्च न्यायालय के
कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति अशोक भूषण ने राजभवन में पूर्व प्रधान
न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई. न्यायमूर्ति
पी. सदाशिवम ने शीला दीक्षित का स्थान लिया.
इस नियुक्ति के साथ ही 65 वर्षीय
न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम भारत के ऐसे पहले प्रधान न्यायाधीश हैं जिन्हें किसी
राज्य का राज्यपाल नियुक्त किया गया. इसके अलावा, जुलाई 2013
से अप्रैल 2014 तक भारत के 40वें प्रधान न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति पी. सदाशिवम नरेंद्र मोदी के
नेतृत्व वाले राजग सरकार द्वारा राज्यपाल पद के लिए नियुक्त होने वाले पहले गैर
राजनीतिक व्यक्ति हैं.
भारत सरकार के अधीन पदानुक्रम में भारत का प्रधान न्यायाधीश राज्यपल से ऊपर होता है. राज्यपाल को संबधित राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या कार्यवाहक न्यायाधीश पद की शपथ दिलाता है. ऐसे में जब कोई सेवानिवृत प्रधान न्यायाधीश किसी राज्य का राज्यपाल नियुक्त होता है तो उसे कभी उसका अधीनस्थ रहा न्यायधीश उसे पद और गोपनीयता की शपथ दिलाए, आदि ऐसे अनेक तथ्य क्या प्रधान न्यायाधीश के पद की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाते?
क्या न्यायधीशों के सेवानिवृत के बाद पद लेने की होड़ से न्यायपालिका की निष्पक्षता प्रभावित नहीं होगी? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो राज्यपालों की नियुक्ति पर अक्सर विवाद पैदा करते हैं.
परन्तु इसके पहले की सरकारों ने भी ऐसे कदम उठाए हैं.
कांग्रेस ने ही पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दिवंगत रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा का सांसद बनाया था. पूर्व प्रधान न्यायाधीश तमाम आयोगों के अध्यक्ष बनते रहे हैं. कानून सुधार पर सरकार की बनाई समितियों के अध्यक्ष बन सकते हैं, तो राज्यपाल क्यों नहीं?
वर्ष 1997 में सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति फातिमा बीबी को भी तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया था. जब सेना प्रमुख, गृह सचिव, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल बन सकते हैं तो प्रधान न्यायाधीश क्यों नहीं.
वैसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 157 के अनुसार वह कोई भी नागरिक जो वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, वह राज्य सरकार या केन्द्र सरकार या इन राज्यों के नियंत्रण के अधीन किसी सार्वजनिक उपक्रम में लाभ के पद पर न हो, वह राज्य विधानसभा का सदस्य चुने जाने के योग्य हो और वह भारत का नागरिक हो, राज्यपाल पद पर नियुक्त किये जाने का पात्र होता है.
संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार- ‘राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से की जाएगी’. किन्तु वास्तव में राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा प्रधानमंत्री की सिफ़ारिश पर की जाती है. राज्यपाल की नियुक्ति के सम्बन्ध में निम्न दो प्रकार की प्रथाएँ बन गयी थीं- 1. किसी व्यक्ति को उस राज्य का राज्यपाल नहीं नियुक्त किया जाएगा, जिसका वह निवासी है. 2. राज्यपाल की नियुक्ति से पहले सम्बन्धित राज्य के मुख्यमंत्री से विचार विमर्श किया जाएगा. यह प्रथा 1950 से 1967 तक अपनायी गयी, लेकिन 1967 के चुनावों में जब कुछ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ, तब दूसरी प्रथा को समाप्त कर दिया गया और मुख्यमंत्री से विचार विमर्श किए बिना राज्यपाल की नियुक्ति की जाने लगी.
वास्तव में देखा जाए तो संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा के जो मॉडल देखे जा रहें हैं वो अस्थायी मनमाने और सरकार सापेक्षिक होते जा रहें हैं. वे सत्ता पक्ष के लिए कुछ और विपक्ष के लिए कुछ.
भारत सरकार के अधीन पदानुक्रम में भारत का प्रधान न्यायाधीश राज्यपल से ऊपर होता है. राज्यपाल को संबधित राज्य के उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या कार्यवाहक न्यायाधीश पद की शपथ दिलाता है. ऐसे में जब कोई सेवानिवृत प्रधान न्यायाधीश किसी राज्य का राज्यपाल नियुक्त होता है तो उसे कभी उसका अधीनस्थ रहा न्यायधीश उसे पद और गोपनीयता की शपथ दिलाए, आदि ऐसे अनेक तथ्य क्या प्रधान न्यायाधीश के पद की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाते?
क्या न्यायधीशों के सेवानिवृत के बाद पद लेने की होड़ से न्यायपालिका की निष्पक्षता प्रभावित नहीं होगी? ऐसे अनेक प्रश्न हैं जो राज्यपालों की नियुक्ति पर अक्सर विवाद पैदा करते हैं.
परन्तु इसके पहले की सरकारों ने भी ऐसे कदम उठाए हैं.
कांग्रेस ने ही पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति दिवंगत रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा का सांसद बनाया था. पूर्व प्रधान न्यायाधीश तमाम आयोगों के अध्यक्ष बनते रहे हैं. कानून सुधार पर सरकार की बनाई समितियों के अध्यक्ष बन सकते हैं, तो राज्यपाल क्यों नहीं?
वर्ष 1997 में सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति फातिमा बीबी को भी तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया था. जब सेना प्रमुख, गृह सचिव, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल बन सकते हैं तो प्रधान न्यायाधीश क्यों नहीं.
वैसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 157 के अनुसार वह कोई भी नागरिक जो वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो, वह राज्य सरकार या केन्द्र सरकार या इन राज्यों के नियंत्रण के अधीन किसी सार्वजनिक उपक्रम में लाभ के पद पर न हो, वह राज्य विधानसभा का सदस्य चुने जाने के योग्य हो और वह भारत का नागरिक हो, राज्यपाल पद पर नियुक्त किये जाने का पात्र होता है.
संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार- ‘राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा प्रत्यक्ष रूप से की जाएगी’. किन्तु वास्तव में राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा प्रधानमंत्री की सिफ़ारिश पर की जाती है. राज्यपाल की नियुक्ति के सम्बन्ध में निम्न दो प्रकार की प्रथाएँ बन गयी थीं- 1. किसी व्यक्ति को उस राज्य का राज्यपाल नहीं नियुक्त किया जाएगा, जिसका वह निवासी है. 2. राज्यपाल की नियुक्ति से पहले सम्बन्धित राज्य के मुख्यमंत्री से विचार विमर्श किया जाएगा. यह प्रथा 1950 से 1967 तक अपनायी गयी, लेकिन 1967 के चुनावों में जब कुछ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ, तब दूसरी प्रथा को समाप्त कर दिया गया और मुख्यमंत्री से विचार विमर्श किए बिना राज्यपाल की नियुक्ति की जाने लगी.
वास्तव में देखा जाए तो संवैधानिक संस्थाओं की मर्यादा के जो मॉडल देखे जा रहें हैं वो अस्थायी मनमाने और सरकार सापेक्षिक होते जा रहें हैं. वे सत्ता पक्ष के लिए कुछ और विपक्ष के लिए कुछ.
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