सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा की
अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने उर्दू को राज्य में दूसरी सरकारी भाषा
का दर्जा देने वाले उत्तर प्रदेश सरकारी भाषा (संशोधन) कानून 1989
को वैध ठहराया. संविधान पीठ ने यह निर्णय 4 सितंबर
2014 को दिया. संविधान पीठ ने कहा कि इस देश के भाषाई कानून
कठोर नहीं बल्कि भाषाई पंथनिरपेक्षता का लक्ष्य हासिल करने के लिए उदार हैं.
पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने उप्र हिंदी साहित्य सम्मेलन की अपील पर
अपनी व्यवस्था में कहा कि संविधान में ऐसा कुछ नहीं है जो राज्य में हिंदी के
अतिरिक्त एक या उससे अधिक भाषाओं के इस्तेमाल की घोषणा से राज्य सरकार को रोकता
है.
संविधान पीठ ने कहा कि किसी राज्य की सरकारी भाषा या भाषाओं से संबंधित अनुच्छेद 345 में ऐसा कुछ नहीं है जो हिंदी के अतिरिक्त राज्य में एक या अधिक भाषाओं को दूसरी भाषा घोषित करने से रोकता है.
न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा के अलावा संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यामयूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति एसए बोबडे शामिल थे.
संविधान पीठ ने कहा कि बिहार, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली जैसे कई राज्य विधानमंडलों ने हिंदी के अतिरिक्त दूसरी भाषाओं को भी सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में मान्यता दी है. यदि संविधान इसकी इजाजत नहीं देता तो ऐसा संभव नहीं हो पाता. दिल्ली में हिंदी के साथ ही पंजाबी और उर्दू को दूसरी सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है.
संविधान पीठ ने कहा कि हिंदी को स्पष्ट रूप से या अलग से राज्य में सरकारी भाषा के रूप में अपनाए जाने का उल्लेख होने की वजह से उसे नहीं लगता कि संविधान किसी अन्य भाषा को सरकारी भाषा के रूप में अपनाने के विधानमंडल के विकल्प को बंद करता है.
संविधान पीठ ने कहा कि किसी राज्य की सरकारी भाषा या भाषाओं से संबंधित अनुच्छेद 345 में ऐसा कुछ नहीं है जो हिंदी के अतिरिक्त राज्य में एक या अधिक भाषाओं को दूसरी भाषा घोषित करने से रोकता है.
न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा के अलावा संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यामयूर्ति दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति एसए बोबडे शामिल थे.
संविधान पीठ ने कहा कि बिहार, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और दिल्ली जैसे कई राज्य विधानमंडलों ने हिंदी के अतिरिक्त दूसरी भाषाओं को भी सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में मान्यता दी है. यदि संविधान इसकी इजाजत नहीं देता तो ऐसा संभव नहीं हो पाता. दिल्ली में हिंदी के साथ ही पंजाबी और उर्दू को दूसरी सरकारी कामकाज की भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त है.
संविधान पीठ ने कहा कि हिंदी को स्पष्ट रूप से या अलग से राज्य में सरकारी भाषा के रूप में अपनाए जाने का उल्लेख होने की वजह से उसे नहीं लगता कि संविधान किसी अन्य भाषा को सरकारी भाषा के रूप में अपनाने के विधानमंडल के विकल्प को बंद करता है.
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