संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने मार्शल द्वीप समूह द्वारा भारत और पाकिस्तान के खिलाफ किये गये परमाणु परीक्षण मामले को ख़ारिज कर दिया.हेग स्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में 16 जजों की बेंच ने 5 अक्टूबर 2016 को यह निर्णय सुनाया. हवाई और फिलीपींस के मध्य स्थित मार्शल द्वीप समूह का आरोप है कि ये देश परमाणु हथियारों की दौड़ को रोक पाने में विफल रहे हैं.
भारत, पाकिस्तान और इंग्लैंड के खिलाफ आरोप लगाये गये कि इन देशों ने परमाणु परीक्षण करके विश्व में परमाणु हथियारों को की होड़ को और तेज़ किया. मार्शल द्वीप समूह का मानना है कि यह देश 1968 की परमाणु अप्रसार संधि को सफल नहीं बना सके.
गौरतलब है कि मार्शल द्वीप समूह के आस-पास वर्ष 1946-58 के मध्य अमेरिका ने कई परमाणु परीक्षण किए जिससे वहां की प्राकृतिक संपदा एवं नागरिक जीवन पर प्रभाव पड़ा. इन वर्षों में अमेरिका और रूस के मध्य शीत युद्ध चरम पर था.
पृष्ठभूमि
• वर्ष 2014 में माजुरो (मार्शल की राजधानी) द्वारा 9 देशों पर आरोप लगाया था कि 1968 के परमाणु अप्रसार संधि के बावजूद परमाणु हथियारों का विस्तार हो रहा है.
• मार्शल द्वीप का कहना है कि परमाणु हथियारों को बढ़ावा देकर भारत, पाकिस्तान और इंग्लैंड ने इस संधि के प्रावधानों का उल्लंघन किया.
• मार्शल द्वीप समूह के पूर्व विदेश मंत्री टोनी डीब्रूम द्वारा 2014 में संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में कैलिफ़ोर्निया आधारित न्यूक्लियर ऐज पीस फाउंडेशन द्वारा यह मामला दायर किया गया.
• टोनी के इन प्रयासों के कारण पीस ब्यूरो द्वारा उन्हें 2016 के नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया.
• गौरतलब है कि चीन, फ्रांस, इज़राइल, उत्तर कोरिया, रूस और अमेरिका ने अभी तक अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायिक दायरे को मान्यता प्रदान नहीं की है.
• वर्ष 2014 में माजुरो (मार्शल की राजधानी) द्वारा 9 देशों पर आरोप लगाया था कि 1968 के परमाणु अप्रसार संधि के बावजूद परमाणु हथियारों का विस्तार हो रहा है.
• मार्शल द्वीप का कहना है कि परमाणु हथियारों को बढ़ावा देकर भारत, पाकिस्तान और इंग्लैंड ने इस संधि के प्रावधानों का उल्लंघन किया.
• मार्शल द्वीप समूह के पूर्व विदेश मंत्री टोनी डीब्रूम द्वारा 2014 में संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में कैलिफ़ोर्निया आधारित न्यूक्लियर ऐज पीस फाउंडेशन द्वारा यह मामला दायर किया गया.
• टोनी के इन प्रयासों के कारण पीस ब्यूरो द्वारा उन्हें 2016 के नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया गया.
• गौरतलब है कि चीन, फ्रांस, इज़राइल, उत्तर कोरिया, रूस और अमेरिका ने अभी तक अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायिक दायरे को मान्यता प्रदान नहीं की है.
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