भारतीय मूल के अमेरिकी प्रोफेसर ने डार्क मैटर की पहचान के लिए ग्लैक्टो– सेसिमिक विधि विकसित की-(16-JAN-2016) C.A

| Saturday, January 16, 2016
भारतीय मूल की अमेरिकी वैज्ञानिक सुकन्या चक्रवर्ती के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने डार्क मैटर की प्रधानता वाली छोटी आकाशगंगाओं का पता लगाने के लिए एक नई विधि– ग्लैक्टोसेसिमोलॉजी विकसित की है.
रोचेस्टर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, न्यूयॉर्क की असिस्टेंट प्रोफेसर सुकन्या चक्रवर्ती ने 7 जनवरी 2016 को किस्सिम्मी में अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसायटी द्वारा आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसके बारे में जानकारी दी. इसे द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स को दे दिया गया है.
खोजी गई विधि आकाशगंगाओं की आंतरिक संरचनाओं और द्रव्यमान का मानचित्र बनाने के लिए ग्लैक्टिक डिस्क पर तरंगों का उपयोग करती है. यह बहुत कुछ भूकंपविज्ञान की तरह ही होता है जो भूकंपीय तरंगों का उपयोग पृथ्वी की आंतरिक संरचना के बारे में जानने के लिए करता है. यह विधि अंतरिक्ष के रहस्यमयी घटनाओं को समझने में मदद करेगी.
प्रक्रिया में टीम ने स्पेक्ट्रोस्कोपिक ऑब्जर्वेशन का उपयोग नोर्मा नक्षत्र में तीन सेफिड वैरिएबल्स की गति की गणना में की. सेफिड वैरिएबल्स एक प्रकार के तारे होते हैं जिन्हें आकाशगंगाओं की दूरी की गणना में पैमाने के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है.
टीम ने कोई 3 लाख प्रकाशवर्ष दूर स्थित डार्क मैटर के प्रभुत्व वाली छोटी आकाशगंगा का पता लगाने के लिए सेफिड वैरिएबल्स का प्रयोग किया. इसके विपरीत, मिल्की  आकाशगंगा के डिस्क पृथ्वी से कोई 48000 प्रकाश वर्ष की दूरी पर समाप्त हो जाते हैं.
अध्ययन में 450000 मील प्रति घंटा (एमपीएच), यानि, मिल्की वे के तारकीय डिस्क में सितारों से 437000 एमपीएच अधिक तेज, की औसत गति से चलने वाले सेफिड वैरिएबल्स के कल्चर को समझने की कोशिश की गई है.
बाद में उन्होंने बताया कि वे रेडियल वेग की तलाश कर रही थी, जो सबूत है और इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह हमारी आकाशगंगा का हिस्सा नहीं है.
डार्क मैटर
डार्क मैटर काल्पनिक  पदार्थ है जिसे टेलिस्कोप के जरिए नहीं देखा जा सकता लेकिन ब्रह्मांड का 85 फीसदी हिस्सा इसी से बना है. यह आज के भौतिक शास्त्र की सबसे बड़ी विचित्रता है और अभी तक  इसे पूरी तकह से समझा नहीं जा सका है.
डार्क मैटर की मौजूदगी और गुण का अनुमान दृश्य पदार्थ, विकिरण और ब्रह्माण्ड की बड़ी संरचनाओं पर अपने गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से लगाया जाता है.
डार्क मैटर को प्रत्यक्ष रूप से नहीं पहचाना जा सकता, जिसकी वजह से यह आधुनिक खगोल भौतिकी में सबसे बड़े रहस्यों में से एक बना हुआ है.

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