सैन्य अदालत ने 13 नवंबर 2014 को कश्मीर के बहुचर्चित मच्छल फर्जी मुठभेड़ कांड में लिप्त एक कर्नल और
एक कैप्टन समेत कुल पांच सैन्यकर्मियों को दोषी करार देते हुए उन्हें उम्र कैद की
सजा सुनाई. इनमें 4 राजपूत रेजीमेंट के तत्कालीन कमान
अधिकारी कर्नल डीके पठानिया, कैप्टन उपेंद्र सिंह, हवलदार देवेंद्र, लांसनायक लख्मी, लांसनायक अरुण कुमार को दोषी पाया गया. दोषियों से सभी प्रकार के सेवा लाभ
भी वापस ले लिए गए.
मच्छल फर्जी मुठभेड़ कांड
सेना की 4 राजपूत रेजीमेंट के जवानों ने 30 अप्रैल 2010 को उत्तरी कश्मीर के मच्छल सेक्टर में
नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ का प्रयास नाकाम बनाते हुए तीन विदेशी आतंकियों को मार
गिराने का दावा किया था. बाद में पता चला कि मारे गए तीनों युवक बारामुला के
रफियाबाद इलाके से लापता हुए शहजाद अहमद, मुहम्मद शफी लोन व
रियाज अहमद थे. इन युवकों की पहचान छिपाने के लिए उनके चेहरे पर काला पेंट लगाया गया
था. शवों के साथ हथियार भी रखे गए थे. फर्जी मुठभेड़ का पता चलते ही पूरे कश्मीर
में हिंसक प्रदर्शन हुए. पुलिस ने इस मामले में दो नागरिकों, टेरिटोरियल आर्मी के एक जवान, सात सैन्यकर्मियों पर
हत्या, अपहरण, आपराधिक साजिश के केस
दर्ज कर सीजेएम सोपोर की कोर्ट में जून, 2010 में आरोप पत्र
दाखिल किया था. बाद में कोर्ट ने वर्ष 2013 में आरोपी
सैन्यकर्मियों के खिलाफ जनरल कोर्ट मार्शल में मामला चलाने की मंजूरी दे दी. कोर्ट
मार्शल में सुनवाई 23 दिसंबर 2013 को
शुरू हुई, जो सिंतबर 2014 में पूरी
हुई. 68 माउंटेन बिग्रेड के ब्रिगेडियर दीपक मेहरा ने
पीठासीन अधिकारी के रूप में कोर्ट मार्शल की सुनवाई की और 4 राजपूत
रेजीमेंट के तत्कालीन कमान अधिकारी कर्नल डीके पठानिया, कैप्टन
उपेंद्र सिंह, हवलदार देवेंद्र, लांसनायक
लख्मी, लांसनायक अरुण कुमार को दोषी पाया.
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