यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के वैज्ञानिकों ने दुनिया के पहले सांस के
जरिए ली जा सकने वाली इबोला टीका का पशुओं पर सफल परीक्षण किया. प्रोफेसर मारिया
क्रोएल के साथ डॉ. ग्रे कोबिंगर ने विन्निपेग के नेशनल माइक्रोबायोलोजी लैबोरेटरी
में परीक्षण के सफल होने की पुष्टि 4 नवंबर 2014
को की.
इस टीके ने घातक इबोला वायरस के खिलाफ नॉन– ह्यूमन प्राइमेट ( गैर– मानव प्राइमेट्स) के लिए
दीर्घकालिक सुरक्षा के लक्षण दिखाए. हाल ही में हुए एक प्री– क्लीनिकल अध्ययन ने इस बात का सबूत दिया कि गैर– इंजेक्शन
वाले इस वैक्सीन की एक खुराक का प्रभाव इबोला वायरस पर लंबे समय तक रहता है जो कि
भविष्य में होने वाले प्रकोप को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता
है.
टीका
वायरस से सबसे अधिक पीड़ित अफ्रीका के कुछ हिस्सों में यह सांस द्वारा ली जा सकने वाली वैक्सीन भंडारण, परिवहन और प्रशासन की बाधाओं को दूर कर सकता है.
वैज्ञानिक क्रोएल ने इबोला जायरे के 1000 प्लाक गठन इकाइयों पर टीकाकरण के 150 दिनों के बाद की स्थिति का अध्ययन कर सांस के जरिए ली जा सकने वाली एक ऐसी दवा को विकसित करने के लिए जो कि नॉन– ह्यूमन प्राइमेट्स के अस्तित्व में 67% से 100% का इजाफा करता है, पर सात वर्षों से भी अधिक काम किया. यह विकास सांख्यिकीय रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इंट्रामस्क्यूलर इंजेक्शन की मानक पद्धति से टीका दिए गए सिर्फ 50% प्राइमेट्स ही बच पाए.
हालांकि प्रगति वायरस के जीव विज्ञान को समझने में बनाया गया है, फिलहाल इस बीमारी से बचने के लिए किसी भी प्रकार का लाइसेंसी टीका या उपचार मौजूद नहीं है.
क्रोएल की टीम के शोध का अगला चरण होगा क्लीनिकल ट्रायल का चरण– 1 जिसमें टीके का मानव पर प्रभाव का परीक्षण किया जाएगा. इसके बाद वे उन प्रारंभिक आंकड़ों का पता लगाएंगे जिन्हें उन्होंने नॉन– ह्यूमन प्रइमेट्स में एक पतली फिल्म के रूप में उनकी जीभ के नीचे रखकर वैक्सीन देने के लिए इक्ट्ठा किया है.
टीका
वायरस से सबसे अधिक पीड़ित अफ्रीका के कुछ हिस्सों में यह सांस द्वारा ली जा सकने वाली वैक्सीन भंडारण, परिवहन और प्रशासन की बाधाओं को दूर कर सकता है.
वैज्ञानिक क्रोएल ने इबोला जायरे के 1000 प्लाक गठन इकाइयों पर टीकाकरण के 150 दिनों के बाद की स्थिति का अध्ययन कर सांस के जरिए ली जा सकने वाली एक ऐसी दवा को विकसित करने के लिए जो कि नॉन– ह्यूमन प्राइमेट्स के अस्तित्व में 67% से 100% का इजाफा करता है, पर सात वर्षों से भी अधिक काम किया. यह विकास सांख्यिकीय रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इंट्रामस्क्यूलर इंजेक्शन की मानक पद्धति से टीका दिए गए सिर्फ 50% प्राइमेट्स ही बच पाए.
हालांकि प्रगति वायरस के जीव विज्ञान को समझने में बनाया गया है, फिलहाल इस बीमारी से बचने के लिए किसी भी प्रकार का लाइसेंसी टीका या उपचार मौजूद नहीं है.
क्रोएल की टीम के शोध का अगला चरण होगा क्लीनिकल ट्रायल का चरण– 1 जिसमें टीके का मानव पर प्रभाव का परीक्षण किया जाएगा. इसके बाद वे उन प्रारंभिक आंकड़ों का पता लगाएंगे जिन्हें उन्होंने नॉन– ह्यूमन प्रइमेट्स में एक पतली फिल्म के रूप में उनकी जीभ के नीचे रखकर वैक्सीन देने के लिए इक्ट्ठा किया है.
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