क्या ऊंची विकास दर देश से गरीबी दूर कर पाएगी?-(12-SEP-2014) C.A

| Friday, September 12, 2014

केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) द्वारा 26 अगस्त 2014 को जारी वित्त वर्ष 2014-15 की अप्रैल-जून तिमाही के आंकड़ों के अनुसार देश की आर्थिक वृद्धि दर 5.7 प्रतिशत दर्ज की गई. यह पिछली नौ तिमाही अर्थात सवा दो साल का सर्वाधिक स्तर है. वित्त वर्ष 2013-14 की समान तिमाही (अप्रैल-जून) में विकास दर 4.7 प्रतिशत थी. अर्थव्यवस्था में महती भूमिका निभाने वाले विनिर्माण क्षेत्र का प्रदर्शन बेहतर रहा है. इस दौरान विनिर्माण क्षेत्र 3.5 प्रतिशत की दर से बढ़ा. बिजली गैस और जलापूर्ति क्षेत्र की विकास दर 10.2 प्रतिशत रही जबकि पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में यह 3.8 प्रतिशत रही थी. इस दौरान वित्त, बीमा, रियल एस्टेट और कारोबारी सेवा क्षेत्र की विकास दर 10.4 प्रतिशत सामुदायिक, सामाजिक और व्यक्तिगत सेवाओं की वृद्धि दर 9.1 प्रतिशत रहा.
केंद्रीय सांख्यिकी संगठन द्वारा जारी आंकड़ों को भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार का संकेत माना गया परन्तु राज्यों के सन्दर्भ में इस तरह के आंकड़े आमतौर पर अलक्षित रह जाते हैं, जबकि राष्ट्रीय आर्थिक वृद्धि दर में उनका कुल योगदान 90 प्रतिशत होता है. केंद्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) की ओर से 9 सितंबर 2014 को जारी राज्यों की विकास दर से संबंधित तथ्यों पर नजर डालें तो अलग ढंग की तस्वीर सामने आती है. 

बिहार राज्य की गणना देश के सर्वाधिक पिछड़े राज्यों में की जाती रही है, परन्तु सीएसओ के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2012-13 में बिहार राज्य की विकास दर 10.73 प्रतिशत रही. देश का यह अकेला राज्य है जिसने इस अवधि में दो अंक में आर्थिक वृद्धि दर दर्ज की. बिहार ने वित्त वर्ष 2011-12 में भी लगभग 10 प्रतिशत और वित्त वर्ष 2010-11 में तो लगभग 15 प्रतिशत विकास दर हासिल की थी.

यदि सीएसओ द्वारा जारी इन आंकड़ों को नरेंद्र मोदी सरकार के आने से निवेशकों में आए उत्साह का परिचायक माना गया तो बिहार के आंकड़ों का श्रेय नीतीश कुमार को क्यों नहीं दिया जाना चाहिए, जो उस दौरान मुख्यमंत्री थे. 

आर्थिक वृद्धि दर के सन्दर्भ में दूसरा सबसे अच्छा प्रदर्शन मध्य प्रदेश राज्य का रहा, जिसकी विकास दर वित्त वर्ष 2012-13 में दस प्रतिशत से कुछ कम रही. इस क्रम में दिल्ली का स्थान तीसरा, गुजरात का छठा और महाराष्ट्र का नौवां रहा. वित्त वर्ष 2012-13 में सबसे धीमी विकास दर 3.39 प्रतिशत तमिलनाडु की रही, जो कि उस वर्ष के राष्ट्रीय औसत से भी कम है. औद्योगिक दृष्टि से अग्रणी राज्य इस आकड़ों में पीछे नजर आए. इसलिए ये आंकड़े निश्चित तौर पर सोचने को मजबूर करते हैं.
तर्क दिया जा सकता है कि इस तरह के आकलन में पिछले वर्ष से तुलना निर्णायक होती है, अगर तुलना का आधार कम हो तो वृद्धि दर अधिक नजर आती है. परन्तु बिहार में लगातार तीन वर्षों में आर्थिक वृद्धि दर दो अंक में बनी रही.

इन सब के बावजूद इस तरह के आकलन को लेकर जेहन में कई प्रकार के प्रश्न उठते हैं  यथा जब वित्त वर्ष 2012-13 में अधिकतर राज्यों की विकास दर उत्साहजनक रही, तो राष्ट्रीय तस्वीर में वह प्रतिबिंबित क्यों नहीं हो सकी? 

जिन राज्यों ने ऊंची वृद्धि दर दर्ज की है, क्या वहां के आम लोगों को इसका लाभ मिल पाया है.
 
यदि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के अंतिम दो वर्षों को छोड़ दें, तो आर्थिक वृद्धि दर आठ से नौ प्रतिशत रही. पर उन वर्षों में भी किसानों के खुदकुशी की. लोग महंगाई से परेशान रहे. देश के 35 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, शिशु और मातृ मृत्यु दर में भारत दुनिया में पहले स्थान पर है आदि. 

अगर ऊंची विकास दर देश की गरीबी को नहीं मिटा सकती तो क्यों आर्थिक विकास को मापने के इस पैमाने को छोड़ दिए जाए!

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