पाकिस्तान की नेशनल असेंबली ने 2 जुलाई 2014 को उत्तरी वजीरिस्तान में तालिबान के
खिलाफ सैन्य अभियान के दौरान पाकिस्तान संरक्षण विधेयक 2014 को
मंजूरी दी. यह विधेयक दो साल के लिए लागू रहेगा.
पाकिस्तान संरक्षण विधेयक, 2014 पाकिस्तान के
खिलाफ युद्ध छेड़ने और सुरक्षा को खतरा पहुंचाने वाले कृत्यों को रोकने में मदद
करता है.
इससे पहले, इस विधेयक को
सर्वसम्मति से सीनेट या उच्च सदन द्वारा 30 जून 2014 को अनुमोदित किया गया था.
विधेयक के मुख्य प्रावधान
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इस अधिनियम के तहत दस्तावेज़ों या
मौखिक साक्ष्य से पाकिस्तानी के रूप में गिरफ्तार आतंकवादी को उसकी नागरिकता से
वंचित किया जाएगा चाहें वह जिस इलाके में गिरफ्तार किया गया हो.
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'पाकिस्तान संरक्षण
विधेयक 2014' के पारित होने के बाद अब ग्रेड 15 (गैर राजपत्रित) कनिष्ठ अधिकारी (जेसीओ) और इससे ऊपर के ओहदे के अधिकारियों
को ऐसे आदेश देने का अधिकार मिल गया.
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यह किसी संदिग्ध को न्यायिक हिरासत
में लिए जाने के बाद उसे 60 दिनों की अवधि के
लिए हिरासत में रखने की इजाजत देता है .
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अधिनियम के तहत सुरक्षाबल किसी
न्यायिक अधिकारी से वारंट हासिल किए बगैर तलाशी कर सकता है.
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मानवाधिकार संगठनों की आशंकाओं को
शांत करने के लिए यह हिरासत केंद्र को अदालतों की निगरानी में रखने और इसके दायरे
में सुरक्षा एजेंसियों द्वारा किसी की हत्या किए जाने पर न्यायिक जांच का प्रावधान
करता है.
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व्यक्ति को अपनी प्रतिबद्धता के
खिलाफ एक उच्च अदालत के समक्ष अपील करने का अधिकार होगा. इससे पहले, व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपील करने का ही अधिकार था.
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इसकी एक अन्य विशेषता चरमपंथ में
दोषी ठहराए जाने वाले को कम से कम 20 साल की कैद की सजा
है.
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पाकिस्तान के मानवाधिकार संगठनों और
विपक्षी दलों के सदस्यों ने इस विधेयक की यह कहते हुए आलोचना की है कि यह सुरक्षा
एजेंसियों को निरंकुश शक्तियां प्रदान करता है.
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सुरक्षाबलों को आतंकवाद, आगजनी, हत्या और स्वास्थ्य अधिकारियों पर हमलों में
संलिप्त संदिग्धों को देखते गोली मारने का अधिकार दिया गया है.
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