ब्रिटेन की महारानी ने 5 जून 2014
को नए विधेयक कानून रिकॉल ऑफ मेंबर ऑफ पार्लियामेंट (एम.पी.) बिल को
लागू करने की घोषणा की.
महारानी द्वारा घोषित यह बिल किसी एमपी के बुरे बर्ताव की
हालात में मजबूरन उपचुनाव कराने की अनुमति देगा. इस बिल को लागू करने का उद्देश्य
मतदाताओं द्वारा उपचुनाव कराए जाने की मांग के जरिए सांसदों के नियामक निरीक्षण
अंतर को भरना है.
रिकॉल ऑफ एम.पी. बिल
• रिकॉल बिल के शुरु होने के आठ सप्ताह के भीतर कम–से–कम दस फीसदी पंजीकृत मतदाताओँ के हस्ताक्षर की जरूरत होगी.
• रिकॉल करने की यह नई शक्ति सिर्फ तभी इस्तेमाल की जा सकेगी जब एम.पी. को जेल की सजा दी जाएगी या हाउस ऑफ कॉमन्स इस बात पर सहमत हो कि वे गत कार्यों में लगे थे.
इस बिल पर भारत की राय
भारत में निर्वाचित विधायकों में अनैतिक और गैर–जिम्मेदाराना व्यवहार में लगातार बढ़ोतरी हो रही है. इसलिए, यहां राइट टू रिकॉल या निर्वाचित प्रतिनिधियों को न चुनने का अधिकार (राइट टू डी–इलेक्ट) की व्यापक मांग की गई है.
राइट टू रिकॉल की जरूरत माननीय सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश में महसूस की. यह एक लोकतांत्रिक हथियार है जो राजनीतिक प्रणाली में अधिक जवाबदेही सुनिश्चित करता है क्योंकि इसमें मतदाता खराब प्रदर्शन करने वाले या अपने कार्यालय का इस्तेमाल स्वार्थों को पूरा करने के लिए करने वाले विधायकों पर नियंत्रण रखता है.
आज की तारीख में, भारत के पास मध्यप्रदेश या छत्तीसगढ़ राज्यों के अलावा रिकॉल का प्रावधान नहीं हैं जहां की जनता को स्थानीय निकायों से अपने प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का हक मिला है.
इसके अलावा, छत्तीसगढ़ में 2008 में स्थानीय निकायों में सफलतापूर्वक रिकॉल चुनाव कराए गए थे.
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