आंतकवाद से संबंधित मामलों की
सुनवाई के संबंध में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 12 दिसंबर 2013 को कहा कि
केंद्रीय अधिनियमों के तहत दर्ज आतंकवाद के मामलों को राज्य (उत्तर प्रदेश) सरकार
केंद्र की अनुमति के बिना वापस नहीं ले सकती. इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ
खण्डपीठ के न्यायाधीशों की खंडपीठ न्यायमूर्ती डी. पी. सिंह, न्यायमूर्ती अजय लाम्बा और न्यायमूर्ती अशोक पाल ने राज्य सरकार के
फैसले के खिलाफ रंजना अग्निहोत्री और पांच अन्य स्थानीय अधिवक्ताओं द्वारा दायर एक
जनहित याचिका पर यह आदेश दिया. जनहित याचिका में आतंकवादी गतिविधियों और
सिलसिलेवार बम धमाकों के आरोपी लोगों के खिलाफ मामलों की वापसी के लिए उत्तर
प्रदेश सरकार से पूछताछ के लिए एक दिशा की मांग की गयी थी. खण्डपीठ ने कहा कि
ज्यादातर आरोपीयों के खिलाफ केंद्रीय अधिनियमों के तहत मामला दर्ज किए जाने के बाद
राज्य सरकार केंद्र सरकार की अनुमति के बिना मामलों को वापस नहीं ले सकती. ये
अपराध गैर-कानूनी गतिविधि के तहत अपराध (रोकथाम) अधिनियम, विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और शस्त्र अधिनियम और भारतीय दंड संहिता के
छठे अध्याय में आते हैं. अत: भारतीय संघ कार्यपालिका में एक जैसे अपराधों के लिए
अभियोजन की वापसी के संबंध में केंद्र सरकार की अनुमति आवश्यक होनी आवश्यक है.
विदित हो कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने अपने 2012 के चुनाव घोषणा पत्र में आतंकवाद के मामलों में फंसे निर्दोष मुसलमानों
को रिहा करने का वादा किया था.
When: 12 दिसंबर 2013
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