वन विभाग के अधिकारियों द्वारा झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले में
उड़ने वाली गिलहरी की एक लुप्तप्राय प्रजाति को 29 अक्टूबर
2014 को पकडा गया. स्थानीय जनजातियां इस प्रजाति को ओराल
कहते हैं.
उड़ने वाली गिलहरी को एक प्राथमिक स्कूल की इमारत के पास एक पेड़ के
नीचे देखा गया था. वन विभाग के अधिकारियों ने बताया है कि प्रजाति विलुप्त होने के
कगार पर है.
इस प्रजाति को कब्जे में लेने के बाद वन अधिकारियों द्वारा उस पर एक चिकित्सा जांच का आयोजन किया गया और इसको बिरसा जूलॉजिकल पार्क,रांची भेजा गया.
उड़ने वाली गिलहरी के बारे में
इस उड़ने वाली गिलहरी का जंतु वैज्ञानिक नाम पेट्रोमयिनी या पेटरोस्टिनी है. उड़ने वाली यह गिलहरी इलिनोइस अमेरिका की मूल निवासी है,और केन और दू पेज काउंटी के कई सघन आबादी वाले क्षेत्रों में पायी जाती है.
उड़ने वाली गिलहरी रात्रि चर जंतु है. इसके शरीर के आगे पीछे और ऊपर झिल्ली होती है. ये झिल्ली इसके पिछले एवं अगले पैरों तक फैल जाती है जिसकी वजह से ये हवा में उड़ पाती है.
ये गिलहरियां घरों में पायी जाने वाली गिलहरियों की तुलना में बहुत अधिक छोटी होती हैं लेकिन उन्ही के बराबर नुक्सान करने में सक्षम होती हैं.
इस प्रजाति को कब्जे में लेने के बाद वन अधिकारियों द्वारा उस पर एक चिकित्सा जांच का आयोजन किया गया और इसको बिरसा जूलॉजिकल पार्क,रांची भेजा गया.
उड़ने वाली गिलहरी के बारे में
इस उड़ने वाली गिलहरी का जंतु वैज्ञानिक नाम पेट्रोमयिनी या पेटरोस्टिनी है. उड़ने वाली यह गिलहरी इलिनोइस अमेरिका की मूल निवासी है,और केन और दू पेज काउंटी के कई सघन आबादी वाले क्षेत्रों में पायी जाती है.
उड़ने वाली गिलहरी रात्रि चर जंतु है. इसके शरीर के आगे पीछे और ऊपर झिल्ली होती है. ये झिल्ली इसके पिछले एवं अगले पैरों तक फैल जाती है जिसकी वजह से ये हवा में उड़ पाती है.
ये गिलहरियां घरों में पायी जाने वाली गिलहरियों की तुलना में बहुत अधिक छोटी होती हैं लेकिन उन्ही के बराबर नुक्सान करने में सक्षम होती हैं.
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