सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरएम लोढा की
अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने न्यायिक अधिकारियों को उन विचाराधीन कैदियों
को रिहा करने के आदेश दिये हैं जिन्होंने अपने अपराधों के लिए अधिकतम सजा की आधी
अवधि काट ली. खंडपीठ ने यह आदेश कुछ जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान 5 सितंबर 2014 को जारी किया.
खंडपीठ ने देशभर की निचली अदालतों के न्यायाधीशों व मजिस्ट्रेटों को
आदेश दिया है कि वे 1 अक्टूबर 2014 से
उनके अधिकार क्षेत्र में आने वाली जेलों का दौरा शुरू करें और आधी सजा काट चुके
विचाराधीन कैदियों की पहचान कर ,सीआरपीसी की धारा 436ए, के प्रावधानों का पालन करते हुए रिहाई का आदेश
जारी करें. खंडपीठ ने निचली अदालतों के न्यायाधीशों से कहा है, कैदियों की रिहाई का आदेश जेल में ही पारित कर दें. न्यायिक अधिकारी दो
महीने तक हर सप्ताह जेल का दौरा कर ऐसे कैदियों की पहचान करेंगे और रिहाई का आदेश
देंगे ताकि सीआरपीसी की धारा 436ए के प्रावधान ठीक से लागू
हों. खंडपीठ स्पष्ट किया कि कैदियों की रिहाई का आदेश देते समय वकीलों की उपस्थिति
जरूरी नहीं है. न्यायिक अधिकारी अपना यह काम पूरा करने के दो महीने बाद अपनी
रिपोर्ट संबंधित उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल को भेजेंगे और वे रिपोर्ट
सर्वोच्च न्यायालय को भेजेंगे.
मामले पर सुनवाई के दौरान पीठ ने धीमी न्याय प्रदान प्रणाली पर भी चिंता जताई. खंडपीठ ने कहा, हमने कई मामलों में श्रेणियां तय कर दी हैं, लेकिन इन श्रेणियों से कुछ नहीं होगा. इसके लिए एक व्यापक योजना बनाने की जरूरत है. अब समस्या का मजबूती से हल ढूंढने का समय आ गया है. जरूरी नहीं कि परिणाम कल ही दिखने लगें पर जल्द ही दिखेंगे.
मामले पर सुनवाई के दौरान पीठ ने धीमी न्याय प्रदान प्रणाली पर भी चिंता जताई. खंडपीठ ने कहा, हमने कई मामलों में श्रेणियां तय कर दी हैं, लेकिन इन श्रेणियों से कुछ नहीं होगा. इसके लिए एक व्यापक योजना बनाने की जरूरत है. अब समस्या का मजबूती से हल ढूंढने का समय आ गया है. जरूरी नहीं कि परिणाम कल ही दिखने लगें पर जल्द ही दिखेंगे.
खंडपीठ ने देशभर की जेलों में बंद कुल कैदियों में 60 प्रतिशत विचाराधीन कैदी होने पर चिंता जताई. आंकड़ों के अनुसार देशभर की
जेलों में कुल 3.80 लाख कैदी हैं. इनमें से 2.54 लाख विचाराधीन कैदी हैं.
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का लाभ उन हजारों गरीब विचाराधीन कैदियों को मिलेगा जो श्योरिटी और जमानत की रकम न होने के कारण जमानत नहीं ले पाते और धीमी न्याय प्रणाली के कारण मुकदमा लंबित रहने तक सजा से ज्यादा जेल काटते हैं.
सीआरपीसी की धारा 436 ए
'इस धारा के मुताबिक अगर कोई विचाराधीन कैदी उस पर लगे आरोपों में दी जाने वाली अधिकतम सजा की आधी सजा के बराबर कैद काट चुका होता है तो अदालत ऐसे कैदी को निजी मुचलके और श्योरिटी या बिना श्योरिटी के भी रिहा कर सकती है. बशर्ते उस विचाराधीन कैदी पर मौत की सजा दिए जाने वाले किसी अपराध का आरोप नहीं होना चाहिए.
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले का लाभ उन हजारों गरीब विचाराधीन कैदियों को मिलेगा जो श्योरिटी और जमानत की रकम न होने के कारण जमानत नहीं ले पाते और धीमी न्याय प्रणाली के कारण मुकदमा लंबित रहने तक सजा से ज्यादा जेल काटते हैं.
सीआरपीसी की धारा 436 ए
'इस धारा के मुताबिक अगर कोई विचाराधीन कैदी उस पर लगे आरोपों में दी जाने वाली अधिकतम सजा की आधी सजा के बराबर कैद काट चुका होता है तो अदालत ऐसे कैदी को निजी मुचलके और श्योरिटी या बिना श्योरिटी के भी रिहा कर सकती है. बशर्ते उस विचाराधीन कैदी पर मौत की सजा दिए जाने वाले किसी अपराध का आरोप नहीं होना चाहिए.
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