सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को सरोगेट बच्चों की नागरिकता पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा-(07-SEP-2014) C.A

| Sunday, September 7, 2014
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 4 सितंबर 2014 को केंद्र सरकार को भारत में भारतीय सरोगेट मां से जन्मे बच्चों की दोहरी नागरिकता देने के मामले में अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है. इन मामलों में बच्चों की जैविक मां विदेशी नागरिक होती हैं.
जस्टिस राणाजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने इस बात पर प्रकाश डाला की भारतीय संविधान के मुताबिक, सरोगेट मां से भारत में जन्मा बच्चा भारतीय नागरिकता का हकदार होता है लेकिन अगर बच्चे की मां विदेशी नागरिक है तो वह बच्चा उस देश की नागरिकता के लिए आवेदन करता है. पीठ से सरकार को कहा है कि वे इस मुद्दे पर गौर करें क्योंकि इसमें व्यापक कानून की जरूरत है जो सरोगेट बच्चे के सभी मुद्दों को हल कर सके.
पीठ ने सरकार से पूछा कि ऐसी स्थितियों से पैदा हुए सरोगेट बच्चों के लिए दोहरी नागरिकता पर विचार करने का विकल्प क्या खुला रखना चाहिए. दोहरी नागरिकता ऐसे बच्चों को सीमित हक दे सकते हैं.
अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल (एएसजी) तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय को अपने जवाब में सूचित किया कि असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी रेगुलेशन बिलसंसद में वर्ष 2010 में पेश किया गया था. उन्हें बिल के स्थिति के बारे में निर्देश मिलेगा. 
एएसजी की प्रतिक्रिया को सुनने के बाद न्यायालय ने मामले की सुनवाई को 6 सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया है, ताकि सरकार की ओर से जवाब दिया जा सके.
पृष्ठभूमि
पहली बार सरोगेट बच्चे से जुड़ी नागरिकता की समस्या तब सामने आई थी जब एक भारतीय सरोगेट मां ने वर्ष 2008 में जर्मन पिता जान ब्लेज के जुड़वा बच्चों को जन्म दिया. इन जुड़वा बच्चों का नाम ब्लाज निकोलस और ब्लाज लीयोनार्ड था.
भारत के संविधान के मुताबिक नागरिकता
भारत के संविधान की नागरिकता भाग– II के अनुच्छेद 5 के तहत संविधान के बनाए जाने के वक्त नागरिकता की परिभाषा में कहा गया था कि, इस संविधान के प्रारंभ पर, भारत के इलाके में अधिवास वाला हर एक व्यक्ति और 
क) जिसका जन्म भारत में हुआ है या 
ख) जिसके मातापिता में से कोई भी एक भारत में जन्मा है या 
ग) जो कमसेकम पिछले पांच वर्षों से भारत में मूल रूप से रह रहा है, भारतीय नागरिक होगा.


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