केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 6 अगस्त 2014 को नाबालिग न्याय (जेजे) अधिनियम, 2000 में संशोधन
के लिए नाबालिग न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) विधेयक, 2014 को मंजूरी दी. केंद्र सरकार की योजना इस विधेयक को संसद के मानसून सत्र
में पेश करने की है.
जेजे विधेयक, 2014 में नाबालिग की उम्र
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यह विधेयक 16 वर्ष से अधिक उम्र के किशोरों जिन पर बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध
का आरोप लगाया गया हो, को व्यस्क मानेगा. जेजे अधिनियम,
2000 18 वर्ष से कम उम्र के किसी भी व्यक्ति को नाबालिग मानेगा.
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यह विधेयक नाबालिग न्याय बोर्ड को
नाबालिगों को नियमित अदालत में ले जाने या सुधार केंद्र भेजने का फैसला लेने का
अधिकार प्रदान करेगा.
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विधेयक के मुताबिक अगर किसी नाबालिग
को नियमित अदालत में भेजा जाता है तो दोषी पाए जाने के बावजूद उसे आजीवन कारावास
या मृत्युदंड की सजा नहीं दी जा सकती. फिलहाल, नाबालिग न्याय
अधिनियम के तहत अधिकतम सजा सुधार केंद्र में तीन वर्ष के कारावास की है.
कानून में प्रस्तावित बदलाव पिछले दो वर्षों में बलात्कार
के मामलों में नाबालिगों के शामिल होने की वजह से किया गया है.
जेजे विधेयक 2014 में संघर्ष क्षेत्र के बच्चों और शारीरिक दंड का प्रावधान
जेजे विधेयक 2014 में संघर्ष क्षेत्र के बच्चों और शारीरिक दंड का प्रावधान
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वैसे उग्रवादी समूह जो बच्चों को
बतौर सैनिक अपने संगठन में शामिल करते हैं या बच्चों का किसी भी अन्य उद्देश्य के
लिए इस्तेमाल करते हैं पर, विधेयक में सात
वर्षों का सश्रम कारावास, पांच लाख रुपए जुर्माना या दोनों
देने का प्रस्ताव दिया गया है.
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शारीरिक और मौखिक दुरुपयोग सहित
शारीरिक दंड की परिभाषा को और व्यापक बनाया गया है.
य़ह उन लोगों के लिए सख्त सजा का प्रस्ताव देता है जो बच्चों को शारीरिक दंड देते हैं जिससे बच्चे को चोट पहुंचती है और बच्चे के लिए भावनात्मक संकट की स्थिति पैदा करते है.
य़ह उन लोगों के लिए सख्त सजा का प्रस्ताव देता है जो बच्चों को शारीरिक दंड देते हैं जिससे बच्चे को चोट पहुंचती है और बच्चे के लिए भावनात्मक संकट की स्थिति पैदा करते है.
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पहले अपराध पर अपराधी को छह माह की
कैद की सजा भुगतनी होगी. बच्चे के शारीरिक चोट और मानसिक आघात की गंभीरता के आधार
पर अपराधी को तीन से पांच वर्ष की कैद और एक लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा हो
सकती है.
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अगर अपराधी बच्चों के लिए काम करने
वाली संस्था का कर्मचारी है तो उसे बार–बार अपराध करने पर
नौकरी से बर्खास्त किया जा सकता है. यहां तक की ऐसी संस्था के प्रबंधन को जांच में
गैर–अनुपालन या असहयोग के लिए तीन वर्ष की कैद या एक लाख
रुपये तक का जुर्माना देने की सजा सुनाई जा सकती है.
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संस्थान के भीतर या बाहर छात्रों की
रैगिंग करने वालों को तीन वर्ष की कैद और एक लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा हो
सकती है. रैंगिग के लिए उकसाने या प्रचार करने का दोषी को भी जेल की सजा होगी.
अगर यह विधेयक संसद में पारित हो जाता है तो भारत उन 40 देशों में शामिल हो जाएगा जहां शारीरिक दंड एक दंडनीय अपराध है.
इसके अलावा, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (डब्ल्यूसीडी) की मंशा गोद लेने की प्रक्रिया को सरल बनाने के उद्देश्य से केंद्रीय दत्तक संसाधन प्राधिकरण (सीएआरए) को सांविधिक निकाय बनाने की है.
इसके अलावा, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (डब्ल्यूसीडी) की मंशा गोद लेने की प्रक्रिया को सरल बनाने के उद्देश्य से केंद्रीय दत्तक संसाधन प्राधिकरण (सीएआरए) को सांविधिक निकाय बनाने की है.
सीएआरए के पास अंतर–देश गोद लेने को
नियमिक करने के साथ गोद लेने और संबंधित मामलों पर दिशानिर्देश जारी करने की शक्ति
होगी.
नाबालिग न्याय अधिनियम के बारे में
नाबालिग न्याय( बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 भारत में नाबालिग न्याय के लिए प्राथमिक कानूनी ढांचा है. यह अधिनियम
नाबालिग न्याय प्रणाली के दायरे में बच्चों की सुरक्षा, उपचार
और पुनर्वास की रुपरेखा प्रदान करता है.
यह कानून, भारत द्वारा वर्ष 1992
में बाल अधिकार कन्वेंशन 1989 पर हस्ताक्षर
करने के बाद नाबालिग न्याय अधिनियम 1986 को निरस्त कर बाल
अधिकार कन्वेंशन 1989 के अनुपालन में लाया गया है.
इस अधिनियम में वर्ष 2006 और वर्ष 2010
में संशोधन किया गया था.
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