28वां सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला 1 फरवरी 2014
को सूरजकुंड, फरीदाबाद (हरियाणा) में शुरू
हुआ. 28वां सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले (2014)
का समापन 15 फरवरी 2014 को
होगा. 28वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेले (2014)
का विषय रखा गया- गोवा राज्य. यह मेला हरियाणा पर्यटन विभाग द्वारा
आयोजित किया जा रहा है.
सूरजकुंड हस्तशिल्प मेले में भारत और सार्क राष्ट्रों के राष्ट्रीय और प्रादेशिक कारीगर भाग ले रहे हैं और अपनी मानवजातीय कला और कारीगरी का प्रदर्शन कर रहे हैं.
यह समारोह खाद्य मेले के रूप में भी मनाया जाता है. पंजाब, दक्षिण भारत और चीन के कुछ परंपरागत लोकप्रिय भोजन और अल्पाहार मेले में आए हैं. साथ ही, मेला लोक-नाट्यशालाओं के सुर-ताल के लिए भी प्रसिद्ध है.
सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला
सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला एक वार्षिक आयोजन है, जो देश की कुछ सर्वोत्तम हथकरघा और हस्तशिल्प परंपराओं का प्रदर्शन करता है. सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला लोक-रंगशालाओं की प्रस्तुतियों के लिए भी समान रूप से प्रसिद्ध है.
उद्देश्य
• देशी-विदेशी पर्यटकों के दर्शनार्थ ग्रामीण परिवेश का सृजन
• शिल्प-रचना में लगने वाली आकर्षक तकनीकों और कौशलों के बारे में देश-विदेश दोनों के शहरी केंद्रों और शैक्षिक संस्थाओं से संबंधित संरक्षकों को शिक्षित करना.
• देश की लुप्त होने वाली हस्तकलाओं की पहचान, पोषण और संरक्षण करना तथा उन्हें भावी पीढ़ियों के लिए बचाकर रखना.
सूरजकुंड हस्तशिल्प मेले में भारत और सार्क राष्ट्रों के राष्ट्रीय और प्रादेशिक कारीगर भाग ले रहे हैं और अपनी मानवजातीय कला और कारीगरी का प्रदर्शन कर रहे हैं.
यह समारोह खाद्य मेले के रूप में भी मनाया जाता है. पंजाब, दक्षिण भारत और चीन के कुछ परंपरागत लोकप्रिय भोजन और अल्पाहार मेले में आए हैं. साथ ही, मेला लोक-नाट्यशालाओं के सुर-ताल के लिए भी प्रसिद्ध है.
सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय हस्तशिल्प मेला
सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला एक वार्षिक आयोजन है, जो देश की कुछ सर्वोत्तम हथकरघा और हस्तशिल्प परंपराओं का प्रदर्शन करता है. सूरजकुंड हस्तशिल्प मेला लोक-रंगशालाओं की प्रस्तुतियों के लिए भी समान रूप से प्रसिद्ध है.
उद्देश्य
• देशी-विदेशी पर्यटकों के दर्शनार्थ ग्रामीण परिवेश का सृजन
• शिल्प-रचना में लगने वाली आकर्षक तकनीकों और कौशलों के बारे में देश-विदेश दोनों के शहरी केंद्रों और शैक्षिक संस्थाओं से संबंधित संरक्षकों को शिक्षित करना.
• देश की लुप्त होने वाली हस्तकलाओं की पहचान, पोषण और संरक्षण करना तथा उन्हें भावी पीढ़ियों के लिए बचाकर रखना.
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