उचित मुआवज़ा और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक (05-sep-2013)

| Thursday, September 5, 2013
उचित मुआवज़ा और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक - लोक सभा में पारित उचित मुआवज़ा और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक 2012  कुछ संशोधनों के साथ राज्यसभा में 4 सितंबर 2013 को पास कर दिया गया. इसके पक्ष में 131 मत और विपक्ष में  10 मत पड़े. यह 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून का स्थान लेना है.
 
यह विधेयक इन संशोधनों के साथ अब पुनः लोकसभा में भेजा जाना है. यह विधेयक लोकसभा में 29 अगस्त 2013 को पारित किया गया था.

ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा कि यह चुनावी नहीं बल्कि जरुरी विधेयक है जिसे तैयार करने में सात साल लगे हैं. उन्होंने कहा कि इसका मसौदा सितंबर 2011 में तैयार किया गया था और इसे सितंबर 2011 में ही लोकसभा में लाया गया था. 

अब इसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के हितों की रक्षा के उद्देश्‍य से अलग से एक अध्‍याय जोड़ा गया है. इसमें कहा गया है कि जहां भी भू-अधिग्रहण किया जाएगा, वहां यह बात स्पष्ट दिखनी चाहिए कि भू-अधिग्रहण के अलावा कोई अन्य उपाय नहीं था. विधेयक में यह भी कहा गया है कि जहां तक संभव होगा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वाले क्षेत्रों में भू-अधिग्रहण नहीं किया जाएगा. अगर ऐसा करना जरूरी हो जाए तो स्थानीय स्वशासन निकायों (यदि स्वशासन परिषदे मौजूद हो तो उन्हें मिलाकर) की सहमति/अनुमोदन से भू-अधिग्रहण किया जाएगा.

विधेयक के मुख्य बिंदु 

इस विधेयक में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा के लिए निम्नलिखित उपाय शामिल किए गए हैं: 
अगर अनुसूचित जातियों और अनुसचित जनजातियों की जमीन का अधिग्रहण करना ही पड़े तो उन्हें एक तिहाई मुआवजा शुरू में ही पहली किश्‍त के रूप में दे दिया जाएगा. बाकी रकम जमी पर क्‍ब्‍जा लेने के बाद दी जानी चाहिए. 
प्रभावित अनुसूचित जनजाति के परिवारों को जहां तक संभव हो उसी क्षेत्र में फिर से बसाया जाए, ताकि वे अपनी जातीय, भाषायी और सांस्‍कृतिक पहचान बनाए रख सकें. 
पुनर्वास मुख्‍य रूप से उन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए होगा, जिनके बारे में सरकार निशुल्‍क सामुदायिक और सामाजिक उत्‍सवों के लिए जमीन देने का फैसला करे.
अनुसूचित जनजाति अथवा अनुसूचित जातियों के सदस्‍यों की भूमि को कानून और नियमों की अनदेखी करके अलग करना गैर कानूनी होगा, अगर ऐसा किया गया तो उस जमीन के पुनर्वास लाभ मूल जनजातीय लोगों अथवा उनके मालिक मूल अनुसूचित जाती लोगों को उपलब्‍ध कराए जाएंगे. 
प्रभावित जनजातीय लोग और परंपरागत रूप से वनबासी तथा अनुसूचित जाति के परिवार जिन्‍हें किसी नदी, तालाब अथवा जलाशय में मछली पकड़ने का अधिकार प्राप्‍त था, उन्हें नये जलाशय, सिंचाई अथवा पनबिजली परियोजना में भी मछली पकड़ने के अधिकार दिए जाएंगे. 
अगर अनुसूचित क्षेत्र से बाहर बसाए गए तो अतिरिक्‍त लाभ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के जिन प्रभावित परिवारों को जिले से बाहर बसाया गया हो उन्हें 25 प्रतिशत अधिक पुनर्वास लाभ प्रदान किए जाएंगे. यह लाभ उन मुद्रा संबंधी लाभों पर आधारित होंगे और उनकी एकबारगी हकदारिता 50 हजार रूपये होगी. 
अनुसूचित जातियों/अनुसूचित जनजातियों को जमीन के बदले जमीन के ज्‍यादा लाभ जिस परियोजना में अनुसूचित जाति अथवा अनुसूचिज जनजाति के लोगों की जमीन जाएगी, उन्हें उतनी ही जमीन जितनी ली गई हो, दी जाएगी. अथवा यह ढाई एकड़, (जो भी कम हो) होगी. 
हर प्रभातिव परिवार को मिलने वाले 3000 रूपये प्रति मास की गुजारे की रकम के अलावा हर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का परिवार जो अनुसूचित क्षेत्र से विस्‍थापित हुआ हो, 50,000 रूपये की राशि पाएगा. 
इसके लिए एक विकास योजना तैयार की जाएगी, जिसमें भू-अधिकार तय करने संबंधी विवरण शामिल किए जाएंगे. 
इसके लिए एक योजना तैयार की जाएगी, जिसमें वैकल्पिक ईंधन, चारे और गैर इमारती लकड़ी सहित वनोपज संसाधन तथा गैर वनोपज संसाधनों की पांच वर्षों तक के लिए व्‍यवस्‍था की जाएगी.
इस विधेयक में सिंचाई परियोजनाओं के लिए अलग प्रावधान जोड़े गए हैं.
इस विधेयक में पुनर्वास व पुनर्स्थापन, उचित मुआवजा, खेतिहर मजदूरों को भी लाभ और दलितों एवं आदिवासियों के लिए खास प्रावधान किया गया है.
आपात उपबंधों पर जयराम ने कहा कि इसमें केवल प्राकृतिक आपदा और राष्ट्रीय सुरक्षा को ही रखा गया है। 
सिंचाई परियोजनाओं के लिए विशेष प्रावधान संशोधन के माध्यम से किए गए हैं. इसके तहत सिंचाई परियोजना की समयावधि में छूट होगी. ऐसी परियोजनाओं में भूस्वामी को सिर्फ जमीन का मुआवजा मिलेगा. 
पुनर्वास व पुनर्स्थापन का प्रावधान विधेयक से हटा लिया गया है. 
संशोधित विधेयक में सिंचाई परियोजनाओं के लिए सामाजिक प्रभाव के आकलन का प्रावधान भी नहीं होगा. 
एक अन्य संशोधन में सिंचाई परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक जमीन और मुआवजे में किसी एक का ही प्रावधान होगा. मूल विधेयक में जमीन और मुआवजा दोनों का प्रावधान था.
विधेयक के प्रावधानों के तहत किसानों की शिकायतों के निपटारे के लिए एक भूमि अपील प्राधिकरण का गठन किए जाने का प्रस्ताव है. इसमें जिन किसानों की भूमि का अधिग्रहण किया गया है और उन्हें पर्याप्त हर्जाना नहीं मिला है, ऐसे किसान अपनी शिकायतों का निपटारा करा सकेंगे. यदि किसान अपील प्राधिकरण के फैसले से संतुष्ट नहीं है तो उन्हें उच्च न्यायालय जाने का भी अधिकार होना है.
इसमें बहुफसल खेती वाली जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाना है और यदि इसकी आवश्यकता भी हुई तो संबंधित राज्य सरकारों द्वारा इस संबंध में निर्णय लिया जाना है. विधेयक में बहुफसली और सिंचित जमीन के अधिग्रहण के बारे में विशेष प्रावधान हैं.
विधेयक में उचित हर्जाना और पारदर्शिता के अधिकार के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी परियोजनाओं के वास्ते भूमि अधिग्रहण हेतु 70 प्रतिशत जबकि निजी कंपनियों द्वारा भूमि अधिग्रहण के लिए 80 प्रतिशत सहमति लेना आवश्यक होना है.
विधेयक में किसानों के लिए उचित और न्यायसंगत हर्जाना देने और कोई भी जमीन बलपूर्वक अधिग्रहित नहीं किए जाने का प्रस्ताव है. 
प्रस्तावित हर्जाने में ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार मूल्य का चार गुना जबकि शहरी क्षेत्रों में बाजार मूल्य के दोगुने तक का हर्जाना दिए जाने का प्रस्ताव है
प्रस्तावित हर्जाने में ग्रामीण क्षेत्रों में बाजार मूल्य का चार गुना जबकि शहरी क्षेत्रों में बाजार मूल्य के दोगुने तक का हर्जाना दिए जाने का प्रस्ताव है.
इस कानून में अधिग्रहण के कारण जीविका खोने वालों को 12 महीने के लिए प्रति परिवार तीन हज़ार रुपये प्रति माह जीवन निर्वाह भत्ता दिए जाने का प्रावधान है.
पचास हजार का पुनर्स्थापना भत्ता, प्रभावित परिवार को ग्रामीण क्षेत्र में 150 वर्ग मीटर में मकान, शहरी क्षेत्रों में 50 वर्गमीटर ज़मीन पर बना बनाया मकान दिए जाने का प्रावधान भी इस कानून में किया गया.




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