छठवीं शताब्दी ईसा पूर्व दिगम्बर ऋषभ देव द्वारा स्थापित
जैन समुदाय को 20 जनवरी 2014 को
अल्पसंख्यक की कोटि में शामिल कर लिया गया. आगामी 2014 के
लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी एवं प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह के बीच विचार विमर्श के बाद केंद्र सरकार द्वारा संविधान के अनुच्छेद 29
(अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण) का समर्थन करते हुए
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के तहत अधिनियम
पारित कर जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा प्रदान किया गया.
केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के तहत किया गया
था. अल्पसंख्यक आयोग द्वारा पहले से ही 5 धार्मिक समुदाय
मुस्लिम, इसाई, सिख, पारसी एवं बौद्ध धर्म को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जा चुका है. अल्पसंख्यक
की कोटि में आने से जैन समुदाय से जुड़े सभी वर्ग (लोग) अब सरकारी योजनाओं एवं
कार्यक्रमों का पूर्ण लाभ उठा सकेंगे. साथ ही साथ, उनके
उत्तरोत्तर विकास की संभवाना भी बढ़ जाएगी. भारत के संविधान में अल्पसंख्यक वर्ग के
लिए निम्नांकित विशेष प्रावधान किये गए हैं –
1) धार्मिक स्वतंत्रता के लिए प्रावधान
2) धार्मिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों के लिए प्रावधान
3) मातृ भाषा में शिक्षा का अधिकार
4) भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकार
5) अपनी रूचि के अनुसार शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना एवं प्रबंधन
2) धार्मिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों के लिए प्रावधान
3) मातृ भाषा में शिक्षा का अधिकार
4) भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए विशेष अधिकार
5) अपनी रूचि के अनुसार शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना एवं प्रबंधन
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के तहत अधिनियम पारित हो जाने से अब जैन समुदाय भी इन सभी विशेष
प्रावधानों का लाभ उठा सकेगा. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के अध्याय 2 की धारा 3 के
अंतर्गत राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के गठन की सम्पूर्ण प्रक्रिया का वर्णन है. गठन
से सम्बंधित जिन तथ्यों का वर्णन इस धारा के अंतर्गत हैं वे तथ्य निम्न है–
1) केंद्र सरकार अधिनियम 1992 के अध्याय 2 की धारा 3 के तहत
प्रदान की गयी सभी शक्तियों के प्रयोग एवं निर्धारित सम्पूर्ण कार्यों के
कार्यान्वयन हेतु एक निकाय का गठन करेगी जिसे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के नाम से
अभिहित किया जायेगा.
2) इस आयोग में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष सहित कुल छह सदस्य होंगे.
3) सभी सदस्य प्रतिष्ठित,निष्ठावान तथा योग्य व्यक्तियों के मध्य से केंद्र सरकार द्वारा नामित
होंगे.
4)अध्यक्ष को छोड़कर अन्य सभी सदस्य
अल्पसंख्यक वर्ग से ही आने चाहिए.
वर्तमान समय में इस आयोग के अध्यक्ष वजाहत हबिबुल्लाह हैं.
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 की धारा 2 (ग) के तहत इस अधिनियम के अधिसूचित होने
से इस समुदाय से जुड़े सभी लोग कल्याण कार्यक्रमों हेतु केंद्रीय निधि द्वारा प्रदत
आर्थिक सहयोग का भी पूरा-पूरा लाभ उठा सकेंगें एवं विद्यार्थी वर्गों को छात्रवृति
भी प्राप्त होगी. इस अधिसूचना के जरिये संविधान के अनुच्छेद 30 (शिक्षा संस्थाओं की स्थापना और प्रशासन करने के अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार)
का पालन करते हुए अब यह समुदाय स्वयं शैक्षणिक संस्थान
की स्थापना के साथ साथ उसके प्रशासन एवं प्रबंधन का
उत्तरदायित्व भी ग्रहण कर सकेगा.
ध्यातव्य है कि छठी शताब्दी ईसा पूर्व ब्राह्मणों के प्रभाव एवं वर्ण व्यवस्था की जटिलता के विरुद्ध अनेक आन्दोलन छेड़े गए थे जिनकी परिणति कुछ धर्मों के उदय के रूप में सामने आई. इसमें से एक धर्म जैन धर्म भी था. अधुना 50 लाख की आबादी वाले इस धर्म की स्थापना ऋषभदेव द्वारा किया गया था तथा 24 तीर्थंकरों के सम्मिलित प्रयास से इस धर्म का विस्तार एवं प्रचार प्रसार सम्पूर्ण भारत तथा विदेशों (इंडोनेशिया ,जावा ,सुमात्रा आदि) में हुआ. जैन धर्म के अंतर्गत आने वाले उन 24 तीर्थंकरों के नाम निम्न हैं-
ध्यातव्य है कि छठी शताब्दी ईसा पूर्व ब्राह्मणों के प्रभाव एवं वर्ण व्यवस्था की जटिलता के विरुद्ध अनेक आन्दोलन छेड़े गए थे जिनकी परिणति कुछ धर्मों के उदय के रूप में सामने आई. इसमें से एक धर्म जैन धर्म भी था. अधुना 50 लाख की आबादी वाले इस धर्म की स्थापना ऋषभदेव द्वारा किया गया था तथा 24 तीर्थंकरों के सम्मिलित प्रयास से इस धर्म का विस्तार एवं प्रचार प्रसार सम्पूर्ण भारत तथा विदेशों (इंडोनेशिया ,जावा ,सुमात्रा आदि) में हुआ. जैन धर्म के अंतर्गत आने वाले उन 24 तीर्थंकरों के नाम निम्न हैं-
1) ऋषभदेव
2) अजितनाथ
3) सम्बनाथ
4) अभिनन्दन
5) सुमतिनाथ
6) पद्मप्रभु
7) सुपार्श्वनाथ
8) चंद्रप्रभु
9) पुष्प्दत
10) शीतलनाथ
11) श्रयांशनाथ
12) वासुपूज्य
13) विमलनाथ
14) अनंतनाथ
15) धर्मनाथ
16) कुयुन्नाथ
17) अर्सनाथ
18) मल्लिनाथ
19) स्थुलबाहू
20) मुनि सुब्रत्नाथ
21) पद्मनाथ
22) नेमिनाथ
23) पार्श्वनाथ
24) वर्धमान महावीर
2) अजितनाथ
3) सम्बनाथ
4) अभिनन्दन
5) सुमतिनाथ
6) पद्मप्रभु
7) सुपार्श्वनाथ
8) चंद्रप्रभु
9) पुष्प्दत
10) शीतलनाथ
11) श्रयांशनाथ
12) वासुपूज्य
13) विमलनाथ
14) अनंतनाथ
15) धर्मनाथ
16) कुयुन्नाथ
17) अर्सनाथ
18) मल्लिनाथ
19) स्थुलबाहू
20) मुनि सुब्रत्नाथ
21) पद्मनाथ
22) नेमिनाथ
23) पार्श्वनाथ
24) वर्धमान महावीर
ऋषभ देव को जैन धर्म के प्रवर्तक संस्थापक एवं प्रथम
तीर्थंकर के रूप में जाना जाता है. समाज के कई वर्ग उस समय धर्म में व्याप्त
विसंगतियो एवं कर्मकांडों से उब चुके थे. धर्म उस समय अभिजात वर्गों के द्वारा
किये कर्मकांडों के रूप में व्याख्यायित होने लगा था. अतः ऋषभदेव ने एक ऐसे
कर्मकांड रहित धर्म की स्थापना पर जोर दिया जो कि समाज के सभी वर्गों को सामान रूप
से ग्राह्य हो और इस क्रम में एक नवीन धर्म जैन धर्म कि स्थापना की.
जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को प्रथम ऐतिहासिक
तीर्थंकर के रूप में जाना जाता है. पार्श्वनाथ ने ही सर्वप्रथम जैन धर्म के तत्व
ज्ञान एवं दार्शनिक सिद्धान्तोंको सुनियोजित एवं सुव्यवस्थित किया ताकि सभी समुदाय
के लिए यह धर्म समान रूप से ग्राह्य हो सके. तीस वर्ष की अवस्था में पार्श्वनाथ ने
गृह त्याग कर दक्षिण भारत में स्थित सम्मेय पर्वत पर कठिन साधना की. कुल 84 दिन की अनवरत साधना के बाद उन्हें कैवल्य की प्राप्ति हुई. अपने जीवनकाल
में लगभग 70 वर्ष तक इन्होंने साकेत, राजगृह,
हस्तिनापुर, कौशाम्बी, श्रावस्ती
आदि क्षेत्रों में इस धर्म का प्रचार प्रसार किया. इनके अनुयायियों को निर्ग्रन्थ
के नाम से जाना जाता है. पार्श्वनाथ के समय जैन समुदाय की कुल जनसंख्या 54,000
थी. पार्श्वनाथ ने जैन धर्म के मुख्य सिद्धान्त पंच महाव्रत के चार
व्रतों अहिंसा,सत्य, अपरिग्रह एवं
अस्तेय की प्रतिष्ठा की, लेकिन इन्होने सर्वाधिक महत्व
अहिंसा को ही प्रदान की. इनकी धारणा थी कि कायाक्लेश एवं तपश्चर्या से ही मोक्ष की
प्राप्ति संभव है. अपने जीवन के अंतिम समय में उन्होंने जैन भिक्षुओं को श्वेत
वस्त्र पहनने का आदेश दिया. केशी इनके प्रमुख शिष्य थे.
जैन धर्म के 24वें एवं अंतिम
तीर्थंकर के रूप वर्धमान महावीर को जैन धर्म का वास्तविक एवं सर्वाधिक प्रभावशाली
तीर्थंकर माना जाता है. इनका जन्म बिहार के वैशाली प्रान्त में स्थित कुंडग्राम
नामक स्थान पर 599 ईसा पूर्व में हुआ था. इनके पिता
सिद्धार्थ वज्जी संघ के प्रमुख सदस्यों में से एक थे तथा माता त्रिशला (उपनाम –विदेह्दता) वैशाली के लिच्छवी कुल के प्रमुख चेतक की बहन थी. वर्धमान
महावीर का विवाह कुंदिन्य गोत्र की यशोदा नामक कन्या के साथ हुआ था. ऐसी मान्यता
है की इन्हें एक पुत्री भी थी जिसका विवाह जामालि नामक एक क्षत्रिय से हुआ था.
महावीर ने तत्व ज्ञान की प्राप्ति हेतु 30 वर्ष की अवस्था
में अपने बड़े भाई नन्दिवर्धन की आज्ञा लेकर गृह त्याग दिया. तेरह महीने की साधना
के उपरांत इनका मन सांसारिक वस्तुओं से ऐसा विरक्त हुआ कि इन्होने वस्त्रो तक का
त्याग कर नंगें रहना प्रारंभ कर दिया. लगभग 12 वर्षों की
दुःसाध्य एवं अनवरत साधना के उपरांत इन्हें 42 वर्ष की
अवस्था में जुम्भिक ग्राम के समीप ॠजुपालिका नदी के तट पर एक साल वृक्ष के नीचे
कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई. कैवल्य प्राप्ति के बाद इन्हें स्वामी, वर्धमान ,केवलिन,जिन,अर्ह तथा निर्ग्रन्थ आदि उपाधियों से विभूषित किया गया l तत्व ज्ञान की प्राप्ति के उपरांत जैन धर्म के सिद्धान्तों के प्रचार
प्रसार हेतु महावीर ने चंपा, वैशाली, मिथिला,
राजगृह, श्रावस्ती, अंग,
कोशल, विदर्भ एवं मगध आदि प्रान्तों का भ्रमण
किया. इन्होने अपने जीवन के तीस साल जैन धर्म के प्रचार प्रसार में व्यतीत कर 72
वर्ष की अवस्था में 527 ईसा पूर्व राजगृह के
निकट स्थित पावा नामक स्थान पर संलेखना पद्धति (शारीरिक एवं मानसिक कष्ट) से
मल्लराजा सस्तिपाल के राजप्रसाद में निर्वाण की प्राप्ति की. पार्श्वनाथ द्वारा
बताये गए चार महाव्रतों में एक पांचवामहाव्रत ब्रह्मचर्य को जोड़कर महावीर ने
महाव्रतों की संख्या पांच कर दी. ध्यातव्य है कि एक तरफ पार्श्वनाथ जहाँ वस्त्र
धारण के समर्थक थे वहीँ महावीर ने वस्त्र त्याग कर निर्वस्त्र रहने पर विशेष जोर
दिया. महावीर स्वामी ने कहा की जैन धर्म के त्रिरत्न सम्यक श्रधा,सम्यक ज्ञान,सम्यक आचरण का पालन करने से कर्मों का
जीव की ओर होने वाला प्रवाह (संवर) रुक जाता है और जीव में पहले से किये गए कर्म
का प्रभाव समाप्त हो जाता है (निर्जरा) जिससे मोक्ष प्राप्ति सुगम हो जाती है,
तथा वह अनंत चतुष्टय (अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन,
अनंत वीर्य, तथा अनंत आनंद) कि प्राप्ति कर भव
बंधन से मुक्त हो जाता है. प्रगतिशील विचारधारा का पोषक यह धर्म नारी को भी
आध्यात्मिक क्षमता के विकास द्वारा निर्वाण प्राप्त करने की अवधारणा का समर्थन
करता है. प्राचीन काल में इस धर्म के प्रमुख केंद्र मथुरा एवं उज्जैन थे. इस धर्म
के अनुयायी प्रारंभिक अवस्था में मूर्ति पूजा के विरोधी थे लेकिन कालांतर में
श्वेताम्बर सम्प्रदाय के अनुयायियों ने महावीर एवं अन्य तीर्थंकरों की प्रतिमा
बनाकर उनकी पूजा करना प्रारंभ कर दी. जैन संघ के
सदस्यों को चार वर्गों में विभाजित किया गया था -
1) भिक्षु
2) भिक्षुणी
3) श्रावक
4) श्राविका
2) भिक्षुणी
3) श्रावक
4) श्राविका
भिक्षु एवं भिक्षुणी पूर्ण रूप से संन्यासी का जीवन व्यतीत
करते थे जबकि श्रावक एवं श्राविका गृहस्थ जीवन में ही रहकर जैन धर्म का पालन करते
थे.
जैन मतानुयायी प्रारंभ से ही कृषि एवं युद्ध के विरोधी थे कारण कि इन दोनों ही क्षेत्रों में जीवों की हिंसा होती है, इसलिए इस धर्म में वाणिज्य एवं व्यापर को अधिक महत्व दिया गया और यही कारण है की आज भी इस समुदाय की अधिकांश जनसंख्या व्यवसायिक समूह से जुडी हुई है. इस धर्म ने बोलचाल की भाषा प्राकृत को अपनाया. इस धर्म का महत्वपूर्ण ग्रन्थ कल्पसूत्र है. भारतीय स्थापत्य कला में इस समुदाय का योगदान अभूतपूर्व रहा है. इसके प्रमुख उदाहरण उड़ीसा का हाथिगुफा मंदिर, राजस्थान के माउन्ट आबू में स्थित दिलवाड़ा मंदिर,कर्णाटक की गोमतेश्वर प्रतिमा, खजुराहो में निर्मित पार्श्वनाथ एवं आदिनाथ का मंदिर इत्यादि हैं.
जैन मतानुयायी प्रारंभ से ही कृषि एवं युद्ध के विरोधी थे कारण कि इन दोनों ही क्षेत्रों में जीवों की हिंसा होती है, इसलिए इस धर्म में वाणिज्य एवं व्यापर को अधिक महत्व दिया गया और यही कारण है की आज भी इस समुदाय की अधिकांश जनसंख्या व्यवसायिक समूह से जुडी हुई है. इस धर्म ने बोलचाल की भाषा प्राकृत को अपनाया. इस धर्म का महत्वपूर्ण ग्रन्थ कल्पसूत्र है. भारतीय स्थापत्य कला में इस समुदाय का योगदान अभूतपूर्व रहा है. इसके प्रमुख उदाहरण उड़ीसा का हाथिगुफा मंदिर, राजस्थान के माउन्ट आबू में स्थित दिलवाड़ा मंदिर,कर्णाटक की गोमतेश्वर प्रतिमा, खजुराहो में निर्मित पार्श्वनाथ एवं आदिनाथ का मंदिर इत्यादि हैं.
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