संयुक्त राष्ट्र महासभा
(यूएनजीए) ने परमाणु हथियार मुक्त विश्व की स्थापना और परमाणु निरस्त्रीकरण की
प्रतिबद्धताओं के कार्यान्वयन में तेजी लाने के लिए एक प्रस्ताव 2 दिसंबर 2014 को पारित किया.
यह प्रस्ताव निरस्त्रीकरण और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर बनी पहली समिति की सिफारिशों के हिस्से के रूप में पेश किया गया था.
यह प्रस्ताव निरस्त्रीकरण और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर बनी पहली समिति की सिफारिशों के हिस्से के रूप में पेश किया गया था.
इसे रिकॉर्ड 169
मतों के जरिए पारित किया गया जबकि 7 ने इसके
खिलाफ वोटिंग की और 5 अनुपस्थित थे.
प्रस्ताव के खिलाफ वोट करने वाले देश थे– डेमोक्रेटिक पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया, फ्रांस, इंडिया, इस्राइल, रुसी संघ, यूनाइटेड किंग्डम और अमेरिका.
अनुपस्थित रहने वाले देश थे भूटान, चीन, फेडरेटेड स्टेट्स ऑफ माइक्रोनेशिया, पाकिस्तान, पलाउ.
प्रस्ताव का प्राथमिक उद्देश्य परमाणु हथियार रखने वाले देशों को तुरंत और बिना शर्त परमाणु अप्रासर संधि (एनपीटी) को स्वीकार करने और अपनी सभी परमाणु सुविधाओं को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी के तहत लाने को कहा गया.
यह प्रस्ताव प्रथम समिति के अन्य 63 मसौदों के साथ पारित किया गया. इनमें अन्य बातों के अलावा शामिल हैं, उन हथियारों के प्रयोग पर रोक लगाने वाला प्रतिज्ञा, बैलिस्टिक मिसाइल प्रसार के खिलाफ हेज आचार संहिता और मध्य पूर्व में परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र की स्थापना.
अपनाए गए अन्य प्रस्तावों में कई हजार परमाणु हथियारों के परिचालन तत्परता को कम कर शीत युद्ध के अंत के बावजूद हाई अर्ल्ट पर बने अंतरराष्ट्रीय तनाव को कम करना, और पांच परमाणु हथियार वाले देशों को परमाणु सिद्धांत की समीक्षा करने और परमाणु हथियारों के प्रयोग के जोखिम को कम करने के लिए कदम उठाने का अनुरोध किया. यह प्रस्ताव और ऐसे ही अन्य प्रस्ताव आमतौर पर संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के तहत नहीं होते लेकिन प्रकृति से प्रतीकात्मक होते हैं.
टिप्पणी
प्रस्ताव के मुख्य लक्षित देश थे- इस्राइल, पाकिस्तान और भारत. इस्राइल और पाकिस्तान ने प्रावधान के खिलाफ भी मतदान किया. भारत प्रमाणु अप्रसार संधि को पांच देशों– अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन के परमाणु हथियार एकाधिकार को बनाए रखने की कोशिश में भेदभावपूर्ण मानता है और इसलिए उसने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) को खारिज कर दिया.
प्रस्ताव के खिलाफ वोट करने वाले देश थे– डेमोक्रेटिक पिपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया, फ्रांस, इंडिया, इस्राइल, रुसी संघ, यूनाइटेड किंग्डम और अमेरिका.
अनुपस्थित रहने वाले देश थे भूटान, चीन, फेडरेटेड स्टेट्स ऑफ माइक्रोनेशिया, पाकिस्तान, पलाउ.
प्रस्ताव का प्राथमिक उद्देश्य परमाणु हथियार रखने वाले देशों को तुरंत और बिना शर्त परमाणु अप्रासर संधि (एनपीटी) को स्वीकार करने और अपनी सभी परमाणु सुविधाओं को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी के तहत लाने को कहा गया.
यह प्रस्ताव प्रथम समिति के अन्य 63 मसौदों के साथ पारित किया गया. इनमें अन्य बातों के अलावा शामिल हैं, उन हथियारों के प्रयोग पर रोक लगाने वाला प्रतिज्ञा, बैलिस्टिक मिसाइल प्रसार के खिलाफ हेज आचार संहिता और मध्य पूर्व में परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र की स्थापना.
अपनाए गए अन्य प्रस्तावों में कई हजार परमाणु हथियारों के परिचालन तत्परता को कम कर शीत युद्ध के अंत के बावजूद हाई अर्ल्ट पर बने अंतरराष्ट्रीय तनाव को कम करना, और पांच परमाणु हथियार वाले देशों को परमाणु सिद्धांत की समीक्षा करने और परमाणु हथियारों के प्रयोग के जोखिम को कम करने के लिए कदम उठाने का अनुरोध किया. यह प्रस्ताव और ऐसे ही अन्य प्रस्ताव आमतौर पर संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के तहत नहीं होते लेकिन प्रकृति से प्रतीकात्मक होते हैं.
टिप्पणी
प्रस्ताव के मुख्य लक्षित देश थे- इस्राइल, पाकिस्तान और भारत. इस्राइल और पाकिस्तान ने प्रावधान के खिलाफ भी मतदान किया. भारत प्रमाणु अप्रसार संधि को पांच देशों– अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन के परमाणु हथियार एकाधिकार को बनाए रखने की कोशिश में भेदभावपूर्ण मानता है और इसलिए उसने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) को खारिज कर दिया.
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