बांग्लादेश
युद्ध अपराध न्यायाधिकरण द्वारा बांग्लादेश की कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के
मुखिया मतीउर्रहमान निज़ामी को 29 अक्तूबर 2014
को वर्ष 1971 में पाकिस्तान के विरुद्ध
बांग्लादेश स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान हज़ारों लोगों की हत्या का ज़िम्मेदार ठहराते
हुए मौत की सजा सुनाई गयी. निज़ामी को पहले ही जनवरी 2014 में,
जब वह उद्योग मंत्री थे, चटगांव हथियार ढोने
के एक मामले में मौत की सजा सुनाई जा चुकी है. हालांकि, 29 अक्टूबर
2014 को निज़ामी के साथ जमात के छह ओर नेताओं को मानवता के
खिलाफ अपराधों के लिए मौत की सजा सुनाई गयी. लंबे समय से इस बहु प्रतीक्षित फैसले
का विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों द्वारा स्वागत किया गया.
पृष्ठभूमि
मतिउर्रहमान निज़ामी वर्ष 1971 में जमात की छात्र शाखा इस्लामी छात्र संघ (अब इस्लामी छात्र शिबिर ) के अध्यक्ष थे जिसने बाद में पाकिस्तानी सेना के कुख्यात सहायक संगठन अल बद्र का रूप ले लिया. निज़ामी अल बद्र नरसंहार दस्ते के प्रमुख नेता के रूप में, अत्याचार, हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में शामिल थे. निज़ामी अपने उन स्थानीय पाकिस्तानी सहयोगियों को दिए गए प्रशिक्षण में भी शामिल थे जिन्होंने मानवता के खिलाफ गंभीर अपराध किये. निज़ामी ने अपने अनुयायियों को बड़े पैमाने पर नरसंहार और अत्याचार के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पवित्र पुस्तक कुरान की गलत व्याख्या की. अदालत ने निज़ामी को बड़े पैमाने पर 14 दिसंबर 1971 को शीर्ष बंगाली पेशेवरों और बुद्धिजीवियों को खत्म करने के लिए गेस्टापो-विधि की तर्ज पर हमलों को संचालित करने का भी दोषी पाया. ये घटना 14 दिसंबर 1971 को हुई यानी 16 दिसंबर 1971 से ठीक दो दिन पहले जिस दिन बांग्लादेश को स्वतंत्रता प्राप्त हुई.
पृष्ठभूमि
मतिउर्रहमान निज़ामी वर्ष 1971 में जमात की छात्र शाखा इस्लामी छात्र संघ (अब इस्लामी छात्र शिबिर ) के अध्यक्ष थे जिसने बाद में पाकिस्तानी सेना के कुख्यात सहायक संगठन अल बद्र का रूप ले लिया. निज़ामी अल बद्र नरसंहार दस्ते के प्रमुख नेता के रूप में, अत्याचार, हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों में शामिल थे. निज़ामी अपने उन स्थानीय पाकिस्तानी सहयोगियों को दिए गए प्रशिक्षण में भी शामिल थे जिन्होंने मानवता के खिलाफ गंभीर अपराध किये. निज़ामी ने अपने अनुयायियों को बड़े पैमाने पर नरसंहार और अत्याचार के लिए प्रोत्साहित करने के लिए पवित्र पुस्तक कुरान की गलत व्याख्या की. अदालत ने निज़ामी को बड़े पैमाने पर 14 दिसंबर 1971 को शीर्ष बंगाली पेशेवरों और बुद्धिजीवियों को खत्म करने के लिए गेस्टापो-विधि की तर्ज पर हमलों को संचालित करने का भी दोषी पाया. ये घटना 14 दिसंबर 1971 को हुई यानी 16 दिसंबर 1971 से ठीक दो दिन पहले जिस दिन बांग्लादेश को स्वतंत्रता प्राप्त हुई.
न्यायाधिकरण ने जमात
प्रमुख को युद्ध अपराध करने के लिए धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के खिलाफ साजिश एवं
हत्या करने का अपराधिक रूप से ज़िम्मेदार ठहराया.
ज्ञातव्य है कि
अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण-1 ने वर्ष 2012
में निज़ामी के खिलाफ 16 आरोप तय किए. उन पर
पाकिस्तानी सेना के साथ साजिश रचने, योजना बनाने और अपराधों
को उकसाने का आरोप था. उन पर हत्या, बलात्कार, लूटपाट और संपत्ति के विनाश और वर्ष 1971 में अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर मान्यता प्राप्त युद्ध अपराधों में शामिल होने का भी आरोप सिद्ध हो चुका
है.
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