स्विट्जरलैंड
ने आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कॉपरेशन एंड डेवलपमेंड, ओईसीडी) की कर मामलों पर आपसी प्रशासनिक सहयोग की बहुपक्षीय संधि पर 15
अक्टूबर 2013 को हस्ताक्षर किए. इस संधि पर
भारत सहित 58 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं. पेरिस स्थित
ओईसीडी ने कर चोरी तथा काले धन को छिपाने से रोकने के लिए वैश्विक कर मानदंड बनाए
हैं.
इस संधि पर हस्ताक्षर करने वाले सभी देश आपस में सूचना एवं सहयोग का आदान- प्रदान करेंगे. इस संधि के तहत स्विट्जरलैंड को दूसरे देशों की सरकारों के साथ स्वत: सूचनकाओं का आदान-प्रदान करना है तथा कालेधन की जांच के संबंध में पारस्परिक आधार पर सहयोग देना है. स्विट्जरलैंड सरकार कर मामलों में सभी प्रकार का आपसी सहयोग करेगी जिसमें जानकारी के लिए आग्रह पर सहयोग, स्वत: तरीके से सूचनाओं का आदान-प्रदान, कर जांच और कर संग्रहण में आधिकारिक सहायता आदि शामिल है.
इस बहुपक्षीय संधि पर स्विट्जरलैंड द्वारा हस्ताक्षर किए जाने की घोषणा करते हुए ओईसीडी ने कहा कि इसमें स्वत: सूचनाओं के आदान-प्रदान का विकल्प है. इसके लिए इच्छुक पक्षों को सहायता के रूप में करार करने की जरूरत होगी. ओईसीडी में कर मामलों के प्रमुख पास्कल सैंट अमान्स ने कहा इस संधि के साथ स्विट्जरलैंड में बैंकिंग गोपनीयता का दौर समाप्त हो जाएगा.
इस फैसले पर अभी स्विटजरलैंड की संसद की स्वीकृति नहीं मिली है. जब तक इसकी वहां से पुष्टि नहीं हो जाती तब तक इस पर अमल नहीं हो सकता.
स्विस नेशनल बैंक
स्विस नेशनल बैंक के ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2012 के अंत तक स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीय द्वारा जमा धन रिकार्ड निचले स्तर 9000 करोड़ रुपए यानी 1.42 अरब स्विस फ्रेंक पर आ गया था. एक साल पहले यह आंकड़ा 14000 करोड़ रुपए यानी 2.18 अरब स्विस फ्रेंक रहा था. इस दौरान दुनिया भर की इकाइयों द्वारा स्विस बैंकों में जमा धन 2012 में घटकर 1500 अरब डालर पर आ गया. इससे एक साल पहले यह 1650 अरब डालर था.
संधि का भारत पर प्रभाव
दूसरे विश्व युद्ध बाद से स्विस बैंक का प्रयोग विश्व भर में कर की चोरी करने और काले धन को छिपाने के लिये किया जाने लगा था. माना जाता है कि भारत के कर चोरों और भ्रष्टाचारियों ने भी कई लाख करोड़ की रकम स्विस बैंकों में जमा कर रखी है. वर्ष 2008 में जब पूरी दुनिया में मंदी आई और इसके बात यूरोजोन कर्ज संकट में फंसा तब "कर चोरों के स्वर्ग" स्विटजरलैंड की बैंकिंग नीतियों में बदलाव करने की मांग उठने लगी. अमेरिकी कर विभाग ने खासतौर से स्विस बैंकों के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपनाया है. इसके साथ ही कई बड़े विवाद भी उठे जब स्विस बैंकों में खाता रखने वालों के बारे में कहीं और से जानकारी सामने आने लगी.
इस समझौते में फिलहाल दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी 20 के सदस्य देश और 40 दूसरे देश शामिल हैं. इन सभी देशों ने आपस में जानकारी साझा करने के साथ ही कर की धोखाधड़ी रोकने के लिए साझा अभियान चलाने पर भी सहमति जताई है. अब तक होता यह था कि इस तरह के मामलों में जांच दूसरे देशों के कानून के जाल में उलझ जाती थी और कर चोरों को इसका फायदा उठाने का मौका मिल जाता था.
विदित हो कि स्विट्जरलैंड पर लंबे समय से विदेशी अधिकारियों के साथ स्विस बैंकों में खातों के बारे में सूचनाओं का आदान-प्रदान करने का दबाव पड़ रहा था. भारत सहित अन्य देशों की इकाइयों द्वारा कर बचाने के लिए इस रास्ते का दुरुपयोग किया जाता रहा है.
इस संधि पर हस्ताक्षर करने वाले सभी देश आपस में सूचना एवं सहयोग का आदान- प्रदान करेंगे. इस संधि के तहत स्विट्जरलैंड को दूसरे देशों की सरकारों के साथ स्वत: सूचनकाओं का आदान-प्रदान करना है तथा कालेधन की जांच के संबंध में पारस्परिक आधार पर सहयोग देना है. स्विट्जरलैंड सरकार कर मामलों में सभी प्रकार का आपसी सहयोग करेगी जिसमें जानकारी के लिए आग्रह पर सहयोग, स्वत: तरीके से सूचनाओं का आदान-प्रदान, कर जांच और कर संग्रहण में आधिकारिक सहायता आदि शामिल है.
इस बहुपक्षीय संधि पर स्विट्जरलैंड द्वारा हस्ताक्षर किए जाने की घोषणा करते हुए ओईसीडी ने कहा कि इसमें स्वत: सूचनाओं के आदान-प्रदान का विकल्प है. इसके लिए इच्छुक पक्षों को सहायता के रूप में करार करने की जरूरत होगी. ओईसीडी में कर मामलों के प्रमुख पास्कल सैंट अमान्स ने कहा इस संधि के साथ स्विट्जरलैंड में बैंकिंग गोपनीयता का दौर समाप्त हो जाएगा.
इस फैसले पर अभी स्विटजरलैंड की संसद की स्वीकृति नहीं मिली है. जब तक इसकी वहां से पुष्टि नहीं हो जाती तब तक इस पर अमल नहीं हो सकता.
स्विस नेशनल बैंक
स्विस नेशनल बैंक के ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2012 के अंत तक स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीय द्वारा जमा धन रिकार्ड निचले स्तर 9000 करोड़ रुपए यानी 1.42 अरब स्विस फ्रेंक पर आ गया था. एक साल पहले यह आंकड़ा 14000 करोड़ रुपए यानी 2.18 अरब स्विस फ्रेंक रहा था. इस दौरान दुनिया भर की इकाइयों द्वारा स्विस बैंकों में जमा धन 2012 में घटकर 1500 अरब डालर पर आ गया. इससे एक साल पहले यह 1650 अरब डालर था.
संधि का भारत पर प्रभाव
दूसरे विश्व युद्ध बाद से स्विस बैंक का प्रयोग विश्व भर में कर की चोरी करने और काले धन को छिपाने के लिये किया जाने लगा था. माना जाता है कि भारत के कर चोरों और भ्रष्टाचारियों ने भी कई लाख करोड़ की रकम स्विस बैंकों में जमा कर रखी है. वर्ष 2008 में जब पूरी दुनिया में मंदी आई और इसके बात यूरोजोन कर्ज संकट में फंसा तब "कर चोरों के स्वर्ग" स्विटजरलैंड की बैंकिंग नीतियों में बदलाव करने की मांग उठने लगी. अमेरिकी कर विभाग ने खासतौर से स्विस बैंकों के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अपनाया है. इसके साथ ही कई बड़े विवाद भी उठे जब स्विस बैंकों में खाता रखने वालों के बारे में कहीं और से जानकारी सामने आने लगी.
इस समझौते में फिलहाल दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों के समूह जी 20 के सदस्य देश और 40 दूसरे देश शामिल हैं. इन सभी देशों ने आपस में जानकारी साझा करने के साथ ही कर की धोखाधड़ी रोकने के लिए साझा अभियान चलाने पर भी सहमति जताई है. अब तक होता यह था कि इस तरह के मामलों में जांच दूसरे देशों के कानून के जाल में उलझ जाती थी और कर चोरों को इसका फायदा उठाने का मौका मिल जाता था.
विदित हो कि स्विट्जरलैंड पर लंबे समय से विदेशी अधिकारियों के साथ स्विस बैंकों में खातों के बारे में सूचनाओं का आदान-प्रदान करने का दबाव पड़ रहा था. भारत सहित अन्य देशों की इकाइयों द्वारा कर बचाने के लिए इस रास्ते का दुरुपयोग किया जाता रहा है.
0 comments:
Post a Comment